इस्लामाबाद/मुंबई, 17 अगस्त 2026 : पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के हिंदू समुदाय को लेकर दिए गए बयान पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आसिफ अली जरदारी ने कहा कि पाकिस्तान की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी देश में रहने वाले हिंदुओं को ‘बर्दाश्त’ करती है और हिंदू वहां स्वतंत्र हैं। उनके इस बयान पर भारत में भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर जरदारी पर तंज कसते हुए सवाल उठाए।
जरदारी ने हिंदुओं को लेकर क्या कहा ?
पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस से जुड़े एक कार्यक्रम में आसिफ अली जरदारी ने भारत की ‘अखंड भारत’ वाली सोच का जिक्र किया। इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान की हिंदू आबादी को लेकर कहा कि मुस्लिम बहुसंख्यक समुदाय देश के हिंदुओं को ‘बर्दाश्त’ करता है और हिंदू पाकिस्तान में स्वतंत्र हैं। जरदारी के इस बयान की भाषा को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि किसी लोकतांत्रिक देश में अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों को ‘बर्दाश्त’ करने की भाषा में पेश करना अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करता है। उनका यह बयान घोर निंदनीय है।
पाकिस्तान में हिंदू आबादी कितनी है ?
जरदारी ने पाकिस्तान की हिंदू आबादी को करीब तीन से चार फीसदी बताया। हालांकि, पाकिस्तान की 2023 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में हिंदुओं की आबादी करीब 2.17 फीसदी दर्ज की गई है। जनगणना में हिंदुओं की संख्या लगभग 52 लाख बताई गई है। इस अंतर को लेकर भी सोशल मीडिया पर जरदारी के बयान की आलोचना हो रही है।
जावेद अख्तर ने जरदारी पर कसा तंज
जरदारी के बयान पर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया के जरिए तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जरदारी को संबोधित करते हुए उनके बयान पर व्यंग्य किया और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर सवाल खड़े किए। जावेद अख्तर ने जरदारी के ‘बर्दाश्त’ वाले बयान को उनकी राजनीतिक सोच से जोड़ते हुए तंज कसा। उनकी टिप्पणी के बाद यह मामला भारत और पाकिस्तान के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चर्चा का विषय बन गया।
पाकिस्तान में सिर्फ हिंदुओं का ही सवाल नहीं
पाकिस्तान के राष्ट्रपति जरदारी के बयान के बाद पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों और विभिन्न मुस्लिम समुदायों की स्थिति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। पाकिस्तान में शिया समुदाय लंबे समय से हिंसा और आतंकी हमलों का सामना करता रहा है। वहीं, अहमदिया समुदाय की स्थिति भी बेहद संवेदनशील है। पाकिस्तान के संविधान में अहमदियों को गैर-मुस्लिम श्रेणी में रखा गया है। मानवाधिकार संगठनों की ओर से समय-समय पर उनके खिलाफ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी शिकायतें सामने आती रही हैं। बलूचिस्तान में भी जबरन गुमशुदगी और मानवाधिकारों से जुड़े आरोप लंबे समय से पाकिस्तान के लिए चुनौती बने हुए हैं।
‘बर्दाश्त’ शब्द पर क्यों उठे सवाल ?
इस पूरे विवाद का केंद्र आसिफ अली जरदारी के बयान में इस्तेमाल किया गया ‘बर्दाश्त’ शब्द है। सवाल यह है कि किसी देश के नागरिकों के अधिकार बहुसंख्यक समुदाय की सहनशीलता पर निर्भर क्यों बताए जाएं ? यह कतई सहीं नहीं है। अल्पसंख्यकों के अधिकार संविधान और कानून से तय होने चाहिए, न कि बहुसंख्यक आबादी की ‘इजाजत’ या ‘बर्दाश्त’ करने की भावना से। इसी वजह से जरदारी के बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।




