नई दिल्ली, 27 अगस्त 2026 : बिहार की ऐतिहासिक धरती पर स्थित नालंदा विश्वविद्यालय एक बार फिर दुनिया के सामने चर्चा का विषय बना है। भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रिसनर ने नालंदा की प्राचीन शैक्षणिक परंपरा और वैश्विक विरासत की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि नालंदा दुनिया की पहली महान आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक थी और यह बोलोग्ना विश्वविद्यालय से 600 साल पुरानी है। यूनेस्को और भारत में संयुक्त राष्ट्र की ओर से भारतीय राजनयिक और लेखक अभय के. की किताब ‘Nalanda: How It Changed the World’ पर आयोजित विशेष सत्र में नालंदा के इतिहास, शिक्षा व्यवस्था और वैश्विक प्रभाव पर चर्चा हुई।

बोलोग्ना से 600 साल पुरानी नालंदा

इस कार्यक्रम में स्टीफन प्रिसनर ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि भारत आने से पहले उन्हें यूरोप के बोलोग्ना शहर में पढ़ने पर गर्व था, जहां दुनिया की सबसे पुरानी विश्वविद्यालय परंपराओं में से एक विकसित हुई, मगर नालंदा उससे भी 600 साल पुरानी है। उन्होंने नालंदा को महान आवासीय विश्वविद्यालय बताते हुए कहा कि यहां चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के विभिन्न हिस्सों से विद्वान अध्ययन के लिए आते थे। नालंदा केवल धार्मिक शिक्षा का केंद्र नहीं था। यहां दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा, कला और तर्कशास्त्र जैसे कई विषयों का अध्ययन और विचार-विमर्श होता था।

नालंदा में होती थी विचारों पर खुलकर बहस

संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर ने नालंदा की सबसे बड़ी विशेषताओं में विचारों के आदान-प्रदान को बताया। उनके मुताबिक यहां अलग-अलग विचारों को परखा जाता था, उन पर बहस होती थी और उन्हें खुले तौर पर साझा किया जाता था। यही वजह है कि नालंदा को केवल भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि Global Knowledge Hub के रूप में भी देखा जाता है।

बहुविषयक शिक्षा का बड़ा केंद्र था नालंदा

किताब के लेखक अभय के. ने बताया कि नालंदा की शिक्षा व्यवस्था काफी व्यापक और बहुविषयक थी। यहां खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, दर्शन और कविता सहित कई विषयों का अध्ययन किया जाता था। उन्होंने कहा कि अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले विद्वान यहां अध्यापन करते थे और योग्य छात्रों को छात्रवृत्ति भी दी जाती थी। नालंदा की यह व्यवस्था आज की शिक्षा प्रणाली के लिए भी प्रेरणा दे सकती है।

नालंदा की विरासत को फिर से जीवंत करने की कोशिश

इस कार्यक्रम में प्राचीन नालंदा की विरासत को आधुनिक भारत की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर भी चर्चा हुई। राजगीर में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 में किया था। इसे प्राचीन नालंदा की गौरवशाली शैक्षणिक परंपरा को आधुनिक रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

UNESCO World Heritage Site है नालंदा

दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने भी नालंदा की वैश्विक विरासत पर बात की। उन्होंने कहा कि नालंदा को उसके Outstanding Universal Value के आधार पर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि नालंदा को विश्व धरोहर का दर्जा देने में दो प्रमुख मानदंड महत्वपूर्ण रहे। नालंदा ने संस्थानों की स्थापना, वास्तुकला, स्थल नियोजन और कलात्मक परंपराओं के ऐसे उदाहरण पेश किए, जिनका प्रभाव बाद में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई संस्थानों पर पड़ा। नालंदा महाविहार एक ऐसी मठवासी संस्था के विकास का उदाहरण है, जो आगे चलकर विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुई। इसने बौद्ध धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र और ज्ञान-विमर्श की परंपराओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में 45 World Heritage Sites

यूनेस्को के मुताबिक भारत की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है। देश में 45 विश्व धरोहर स्थल हैं। नालंदा भी इनमें शामिल है। टिम कर्टिस ने कहा कि विश्व धरोहर सूची में शामिल होना केवल सम्मान की बात नहीं, बल्कि इन ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की जिम्मेदारी भी है। नालंदा का इतिहास आज भी दुनिया को शिक्षा, संवाद और ज्ञान के आदान-प्रदान की ताकत का संदेश देता है। संयुक्त राष्ट्र और यूनेस्को के कार्यक्रम में इसकी चर्चा ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि Nalanda सिर्फ बिहार की पहचान नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन Global Knowledge Legacy का महत्वपूर्ण हिस्सा है।