नई दिल्ली, 27 अगस्त 2026 : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाए जाने के बीच भारत ने अपने रुख को स्पष्ट रखा है। विवाद मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा और रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजनाओं से जुड़ा है। भारत का कहना है कि सिंधु जल संधि से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए समानांतर प्रक्रियाएं चलाना संधि की मूल व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। इसी वजह से भारत ने संबंधित कार्यवाहियों में शामिल होने से इनकार किया है।

क्या है सिंधु जल संधि ?

1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि हुई थी। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं। समय के साथ पाकिस्तान ने भारत की कुछ जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्ति जताई। इनमें किशनगंगा और रतले परियोजनाएं प्रमुख हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की वजह क्या है ?

पाकिस्तान का आरोप रहा है कि भारत की कुछ जलविद्युत परियोजनाएं संधि के प्रावधानों को प्रभावित करती हैं। भारत इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और उसका कहना है कि परियोजनाएं निर्धारित नियमों और तकनीकी प्रावधानों के तहत बनाई जा रही हैं। विवाद बढ़ने के बाद मामला न्यूट्रल एक्सपर्ट और Permanent Court of Arbitration (PCA) जैसी व्यवस्थाओं तक पहुंचा। भारत ने समानांतर प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई और इन कार्यवाहियों में अपनी भागीदारी से साफ इनकार किया।

क्या अंतरराष्ट्रीय अदालत भारत को मजबूर कर सकती है ?

यह मुद्दा इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं किसी विवाद पर प्रक्रिया चला सकती हैं और अपने नियमों के तहत निर्णय दे सकती हैं, लेकिन किसी संप्रभु देश पर निर्णय को लागू करने की क्षमता अलग कानूनी और व्यावहारिक सवाल है। भारत का रुख है कि वह ऐसी किसी प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करता जिसे वह सिंधु जल संधि के मूल ढांचे के खिलाफ मानता है। हालांकि, यह कहना कि अंतरराष्ट्रीय कानून की कोई भूमिका ही नहीं है, सही नहीं होगा। भारत और पाकिस्तान के बीच संधि स्वयं एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है और इससे जुड़े अधिकार एवं दायित्व कानूनी प्रावधानों से निर्धारित होते हैं।

वर्ल्ड बैंक की क्या भूमिका है ?

सिंधु जल संधि में विश्व बैंक की भूमिका मुख्य रूप से प्रक्रियात्मक और प्रशासनिक है। विवादों के समाधान के लिए संधि में अलग-अलग तंत्रों का प्रावधान किया गया है। यही वजह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संधि, तकनीकी प्रक्रियाओं और कूटनीतिक हितों से जुड़ा विषय भी है।

पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है सिंधु जल संधि ?

पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए सिंधु नदी प्रणाली बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत की ओर से संधि को लेकर उठाया गया कोई भी कदम पाकिस्तान के लिए रणनीतिक और आर्थिक चिंता का विषय बनता है। वहीं भारत जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत परियोजनाओं को विकास और ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देखता है।

भारत का रुख क्या है ?

भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपने रणनीतिक और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों पर अपना पक्ष मजबूती से रखेगा। किशनगंगा और रतले जैसी परियोजनाओं को लेकर भारत का कहना है कि वह अपने अधिकारों के अनुरूप जल संसाधनों का उपयोग कर रहा है। ऐसे में सिंधु जल संधि का विवाद आने वाले समय में भी भारत-पाकिस्तान संबंधों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अहम मुद्दा बना रह सकता है।