नई दिल्ली, 19 अगस्त 2026 : क्या पुलिस गिरफ्तार किए गए आरोपियों की फोटो और वीडियो अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट कर सकती है ? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार आरोपियों के फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने से उनके निजता, गरिमा और सम्मान के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

पुलिस पोस्ट पर उठे सवाल

याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में कहा कि कई बार पुलिस के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर ऐसे वीडियो और तस्वीरें पोस्ट की जाती हैं, जिनमें आरोपी हथकड़ी पहने, रस्सियों से बंधे या कथित तौर पर दुर्व्यवहार की स्थिति में दिखाई देते हैं।याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह की तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक होने से आरोपी को सार्वजनिक अपमान और मीडिया ट्रायल का सामना करना पड़ सकता है।

पहचान उजागर होने से जांच पर भी असर ?

PIL में यह भी दलील दी गई कि आरोपियों की पहचान सार्वजनिक करने से आपराधिक मामलों की जांच और ट्रायल की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से पहचानने योग्य तरीके से पेश किए जाने से Test Identification Parade (TIP) की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर असर पड़ सकता है। TIP आपराधिक मामलों में पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। याचिका में यह भी कहा गया कि अगर किसी आरोपी को चलने में परेशानी या चोट की स्थिति में सार्वजनिक किया जाता है, तो इससे पुलिस हिरासत में कथित दुर्व्यवहार या टॉर्चर को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं।

चंडीगढ़ पुलिस मॉडल लागू करने की मांग

जनहित याचिका में चंडीगढ़ पुलिस मॉडल को देशभर में लागू करने की मांग की गई है। इस मॉडल के तहत पुलिस द्वारा पीड़ितों, आरोपियों, शिकायतकर्ताओं या गवाहों की पहचान इस तरह सार्वजनिक करने पर रोक लगाने की बात कही गई है, जिससे उनकी प्राइवेसी, गरिमा और सुरक्षा प्रभावित हो।सुप्रीम कोर्ट ने इसी मांग को लेकर केंद्र और संबंधित सरकारों से जवाब मांगा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए भी मांग

इस याचिका में Instagram और Facebook जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता चाहता है कि ऐसे कंटेंट की पहचान और रोकथाम के लिए व्यवस्था हो, जिसमें किसी अपराध के आरोपी की पहचान उजागर होती हो या उसके साथ अमानवीय व अपमानजनक व्यवहार दिखाया जाता हो। इसके अलावा अगर ऐसा कंटेंट पहले से सोशल मीडिया पर मौजूद है तो उसे पारदर्शी और व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत जल्द हटाने की व्यवस्था करने की भी मांग की गई है।

अब सरकार के जवाब पर नजर

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल सरकारों से जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत के अंतिम निर्देश आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि पुलिस द्वारा आरोपियों की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने को लेकर क्या कानूनी सीमाएं और दिशानिर्देश तय किए जाते हैं। यह मामला आरोपी की निजता और गरिमा बनाम पुलिस की सार्वजनिक सूचना एवं संचार व्यवस्था के बीच संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाता है।