नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026 : भारतीय राजनीति में पारंपरिक राजनीतिक दलों के साथ-साथ नए तरह के राजनीतिक प्रयोग भी देखने को मिल रहे हैं। तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में शुरू हो गई है 'पॉलिटिकल स्टार्टअप' मॉडल। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम ने तो यहीं बयां कर रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में सुदूर दक्षिण से उत्तर के राज्यों में नई सियासी पार्टियां उभर कर सामने आई है, उसके परिणाम तो यहीं दिखाता है। राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर, तमिल अभिनेता से राजनेता बने सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) और तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई अलग-अलग तरीकों से राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इन तीनों नेताओं की राजनीतिक पृष्ठभूमि, विचारधारा और काम करने का तरीका एक-दूसरे से अलग है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषण में इनके प्रयोग को एक नए 'पॉलिटिकल स्टार्टअप' मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है। इस मॉडल में पारंपरिक पार्टी संगठन और लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक समीकरणों के बजाय नए नेतृत्व, व्यक्तिगत ब्रांड, आधुनिक कैंपेन और नए मुद्दों पर जोर दिखाई देता है।
बिहार के बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत
प्रशांत किशोर की राजनीति में एंट्री एक राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर उनकी पहचान के बाद हुई। बिहार में उन्होंने जन सुराज अभियान के जरिए राजनीति में अपनी जमीन तैयार की। 2022 में उन्होंने बिहार में लंबी पदयात्रा शुरू की और बाद में जन सुराज को राजनीतिक पार्टी के रूप में आगे बढ़ाया। उनके राजनीतिक अभियान में शिक्षा, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, पेंशन, कृषि और शासन जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी गई। हालिया बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में उनकी जीत को उनके राजनीतिक प्रयोग के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस जीत ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या पारंपरिक राजनीतिक गढ़ों में नए संगठन और नए राजनीतिक ब्रांड के लिए जगह बन रही है।
थलपति विजय का राजनीति में प्रवेश
तमिल अभिनेता थलपति विजय ने 2024 में अपनी राजनीतिक पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम (TVK) की शुरुआत की। फिल्मों से मिली लोकप्रियता को राजनीतिक समर्थन में बदलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रही। थलपति विजय की राजनीति में सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, महिला कल्याण और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जोर दिया गया। उन्होंने अपनी पार्टी को पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की। हालांकि किसी फिल्म स्टार की लोकप्रियता को चुनावी वोट में बदलना आसान नहीं होता। इसके लिए संगठन, जमीनी नेटवर्क और लगातार राजनीतिक गतिविधियों की जरूरत होती है। इसलिए विजय का राजनीतिक सफर तमिलनाडु की स्थापित पार्टियों के सामने एक नई चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
अन्नामलाई का अलग राजनीतिक प्रयोग
प्रशांत किशोर और विजय से अलग के. अन्नामलाई का राजनीतिक सफर प्रशासनिक सेवा से शुरू हुआ। पूर्व IPS अधिकारी अन्नामलाई ने भाजपा के साथ सक्रिय राजनीति में कदम रखा और तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक राह बनाने का फैसला किया। जून 2026 में उन्होंने 'वी द लीडर्स' नाम से एक राजनीतिक आंदोलन शुरू करने की घोषणा की। उनका लक्ष्य इसे आगे चलकर राजनीतिक संगठन के रूप में विकसित करना बताया गया है। अन्नामलाई का मॉडल चुनाव से ठीक पहले पार्टी बनाने के बजाय पहले संगठन खड़ा करने और भविष्य में चुनावी मैदान में उतरने पर आधारित बताया जा रहा है।
क्या भारत में शुरू हो रही है 'स्टार्टअप पॉलिटिक्स'?
भारतीय राजनीति में नए राजनीतिक दलों का उभरना कोई नई घटना नहीं है। अतीत में भी कई पार्टियां आंदोलनों, क्षेत्रीय अस्मिता या नए राजनीतिक विचारों से पैदा हुई हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP), असम गण परिषद (AGP) और बाद में आम आदमी पार्टी (AAP) इसके उदाहरण हैं। इन दलों ने पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए अपनी जगह बनाई। सोशल मीडिया और डिजिटल कैंपेन के बढ़ते प्रभाव ने नए नेताओं के लिए मतदाताओं तक सीधे पहुंचने का रास्ता भी आसान किया है। इससे राजनीतिक दलों के लिए केवल पारंपरिक संगठन पर निर्भर रहने की जरूरत कुछ हद तक कम हुई है।
पारंपरिक पार्टियों की ताकत अब भी बरकरार
हालांकि, नए राजनीतिक प्रयोगों के बावजूद भाजपा, कांग्रेस और अन्य स्थापित क्षेत्रीय दलों की भूमिका खत्म होती नहीं दिख रही है। इन पार्टियों के पास वर्षों से तैयार जमीनी संगठन, कार्यकर्ता नेटवर्क, स्थानीय नेतृत्व और व्यापक राजनीतिक संसाधन मौजूद हैं। जाति, धर्म, क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय सामाजिक समीकरण भारतीय चुनावों में अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में नए राजनीतिक संगठनों के लिए लोकप्रियता को स्थायी चुनावी संगठन में बदलना बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल प्रशांत किशोर, थलपति विजय और अन्नामलाई जैसे नेताओं के प्रयोग यह संकेत जरूर देते हैं कि भारतीय राजनीति में नए नेतृत्व, व्यक्तिगत ब्रांड व आधुनिक राजनीतिक कैंपेन की भूमिका बढ़ रही है। क्या यह बदलाव स्थापित राजनीतिक दलों के लिए बड़ी चुनौती बनेगा, इसका जवाब आने वाले चुनावों में मिलेगा।




