नई दिल्ली | 04 अगस्त 2026

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को मौखिक रूप से कहा कि कानून में बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि पहले से दिए गए अधिकार स्वतः समाप्त हो जाएं। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि नया कानून पुराने कानून के तहत जारी किए गए ट्रांसजेंडर पहचान पत्र (Transgender Card) को स्वतः या पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से अमान्य नहीं कर सकता। इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ कर रही है।

क्या है पूरा मामला ?

याचिकाकर्ताओं, जिनमें ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, ने 2026 के संशोधन कानून को चुनौती दी है। उनका कहना है कि नए प्रावधान स्वयं की जेंडर पहचान (Self-identification) के अधिकार को सीमित करते हैं और राज्य को पहचान तय करने का व्यापक अधिकार देते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के 2014 के NALSA फैसले की भावना के विपरीत है, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के आत्म-पहचान के अधिकार को मौलिक अधिकारों का हिस्सा माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि यदि कानून में बदलाव भी होता है, तो पहले से दिए गए अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि यदि विधायिका का उद्देश्य पुराने ट्रांसजेंडर कार्डों को अमान्य करना होता, तो कानून में इसे स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाता।

केंद्र सरकार ने मांगा जवाब दाखिल करने का समय

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। उन्होंने कहा कि जेंडर पहचान से जुड़े मामलों का प्रभाव उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे कानूनी मुद्दों पर भी पड़ सकता है, इसलिए केंद्र सरकार कानून का विस्तृत अध्ययन कर अपना पक्ष रखेगी। अंतरिम राहत की मांग पर उन्होंने कहा कि यह मामला सामान्य पहचान पत्र जैसा नहीं है और सरकार अपना जवाब दाखिल करना चाहती है।

NALSA फैसले का क्यों हो रहा है जिक्र?

साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत सरकार मामले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी जेंडर पहचान स्वयं तय करने का अधिकार मान्यता दी थी। इसके बाद ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 लागू किया गया था। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2026 का संशोधन कानून इस सिद्धांत को कमजोर करता है।