नई दिल्ली, 20 अगस्त 2026 : संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए भारत की दावेदारी को फिलिस्तीन का समर्थन मिला है। हालांकि भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंध मजबूत होने के बावजूद फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन किया है। अब सवाल यह है कि क्या अन्य अरब और मुस्लिम देश भी भारत की दावेदारी के समर्थन में खुलकर सामने आएंगे ?

फिलिस्तीन ने भारत की दावेदारी का किया समर्थन

फिलिस्तीनी अथॉरिटी के भारत में राजदूत अब्दुल्ला अबू शावेश ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट की दावेदारी का समर्थन किया। यह बयान भारत और फिलिस्तीन के अधिकारियों के बीच हुई कई राजनयिक बैठकों के बाद सामने आया है।भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में दुनिया की बदलती राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को सुरक्षा परिषद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

अरब देशों का रुख क्यों है अहम ?

भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए अरब और मुस्लिम देशों का रुख महत्वपूर्ण माना जाता है। OIC यानी इस्लामिक सहयोग संगठन में 57 सदस्य देश हैं, जो मध्य पूर्व, अफ्रीका, मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया सहित कई क्षेत्रों में फैले हुए हैं। फिलिस्तीन ने भारत का समर्थन जरूर किया है, लेकिन सभी अरब देशों ने अभी तक भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर समान रूप से स्पष्ट और औपचारिक समर्थन नहीं दिया है। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के भारत के साथ मजबूत रणनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंध हैं। ऐसे में आने वाले समय में इन देशों का रुख भारत की UNSC रणनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।

पाकिस्तान की वजह से भी जटिल है मामला

भारत की UNSC दावेदारी के संदर्भ में पाकिस्तान का रुख भी अहम है। पाकिस्तान कई अंतरराष्ट्रीय और OIC मंचों पर भारत के खिलाफ अपनी स्थिति रखता रहा है। ऐसे में कुछ मुस्लिम और अरब देशों को भारत के साथ अपने संबंधों तथा व्यापक क्षेत्रीय कूटनीतिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। हालांकि, कई अरब देश संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार और विकासशील देशों के बेहतर प्रतिनिधित्व की मांग का समर्थन करते हैं। लेकिन सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वीटो पावर जैसे मुद्दों पर सामूहिक सहमति बनना अब भी चुनौतीपूर्ण है।

भारत और फिलिस्तीन के रिश्ते पुराने हैं

भारत और फिलिस्तीन के संबंध लंबे समय से चले आ रहे हैं। भारत ने 1970 के दशक में फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को मान्यता दी थी। इसके बाद 1988 में भारत ने फिलिस्तीन राज्य को भी मान्यता दी। भारत फिलिस्तीन के विकास कार्यों में भी सहयोग करता रहा है। स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई प्रोजेक्ट में भारत की मदद रही है। भारत की विदेश नीति में इजरायल के साथ रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ फिलिस्तीन के लिए समर्थन जारी रखने की नीति भी दिखाई देती है।

इजरायल के साथ बढ़े भारत के रक्षा संबंध

पिछले एक दशक में India-Israel Relations में तेजी से मजबूती आई है। दोनों देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा, तकनीक, कृषि और व्यापार समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है। भारत इजरायल से रक्षा उपकरण और तकनीक भी खरीदता है। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजरायल को हथियारों की आपूर्ति को लेकर भारत पर सवाल भी उठाए गए हैं। इसके बावजूद भारत फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपने पारंपरिक रुख और Two-State Solution के समर्थन को दोहराता रहा है।

अब बड़ा सवाल—क्या मुस्लिम देश देंगे भारत का साथ ?

फिलिस्तीन का समर्थन भारत के लिए कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। अब नजर इस बात पर है कि सऊदी अरब, UAE और दूसरे अरब एवं मुस्लिम देश भारत की दावेदारी पर क्या रुख अपनाते हैं। यदि इन देशों का समर्थन भारत को मिलता है, तो संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता की उसकी कोशिश को महत्वपूर्ण कूटनीतिक मजबूती मिल सकती है।