नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026 : भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्यायपालिका की भूमिका, संविधान की सर्वोच्चता, लंबित मामलों और न्यायिक सक्रियता जैसे अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका किसी पक्ष या विपक्ष के लिए फैसला नहीं करती, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। CJI सूर्यकांत ने संविधान को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताते हुए कहा कि समानता, गरिमा, कानून का शासन, लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्र न्यायपालिका जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करना न्यायपालिका की अहम जिम्मेदारी है।
‘न्यायपालिका किसी पक्ष के लिए फैसला नहीं करती’
CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों के फैसले किसी राजनीतिक पक्ष या विपक्ष को ध्यान में रखकर नहीं होते। न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों और संविधान की रक्षा के आधार पर निर्णय करती है।उन्होंने कहा कि संविधान में किए गए मूल वादों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, भारतीय न्यायपालिका की भूमिका संविधान के बुनियादी ढांचे की रक्षा और उसे मजबूत करने की है।
डॉकेट मैनेजमेंट से घटेंगे लंबित मामले
मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट समेत देश की अदालतों में लंबित मामलों को कम करने के लिए डॉकेट मैनेजमेंट यानी केस मैनेजमेंट पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि CJI का पद संभालने के बाद लंबित मामलों के निपटारे को प्राथमिकता दी गई। इसके लिए एक व्यवस्थित केस मैनेजमेंट योजना तैयार की गई। संवैधानिक पीठों का गठन करने और समान प्रकृति के मामलों को एक साथ जोड़ने से महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई को व्यवस्थित करने में मदद मिली।
पहले महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामलों पर फोकस
CJI सूर्यकांत के अनुसार, कुछ मामले बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण होते हैं, जिनका असर देश और विभिन्न अदालतों पर व्यापक स्तर पर पड़ता है। ऐसे मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से बड़ी संख्या में दूसरे मामले भी प्रभावित होते हैं। इसी वजह से महत्वपूर्ण मामलों को पहले निपटाने और समान मामलों को समूह में सुनने की रणनीति अपनाई गई है। इसका उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम करना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
न्यायिक सक्रियता को लेकर CJI ने क्या कहा ?
न्यायिक सक्रियता पर चल रही बहस के बीच CJI सूर्यकांत ने कहा कि संविधान का मूल ढांचा परिस्थितियों के बदलने के बावजूद कायम रहेगा और उसकी रक्षा करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि समाज के कमजोर और हाशिए पर रहने वाले वर्गों के लिए न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। ऐसे कई लोग हैं जो अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के लिए आसानी से अदालत तक नहीं पहुंच सकते।
PIL और स्वत: संज्ञान क्यों जरूरी ?
CJI सूर्यकांत ने जनहित याचिका (PIL) और स्वत: संज्ञान (Suo Motu) को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, इन माध्यमों से उन लोगों के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है जो खुद अदालत का दरवाजा खटखटाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जब किसी समुदाय या समाज के बड़े हिस्से के अधिकारों का सवाल हो, तो अदालत की जिम्मेदारी बनती है कि वह उन अधिकारों की रक्षा करे। इसी भूमिका को कई बार न्यायिक सक्रियता कहा जाता है।
‘न्यायिक सक्रियता को गलत नजरिए से नहीं देखना चाहिए’
CJI सूर्यकांत ने कहा कि न्यायिक सक्रियता का उद्देश्य ऐसे लोगों तक न्याय पहुंचाना है जो सीधे अदालत के सामने अपनी बात नहीं रख सकते। उनके मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति जनता के प्रतिनिधि के तौर पर जनहित का मुद्दा अदालत में उठाता है या अदालत खुद किसी मामले का संज्ञान लेती है, तो इसका मकसद अधिकारों की रक्षा करना होता है। उन्होंने न्यायिक सक्रियता को कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी का अहम हिस्सा बताया।
CJI सूर्यकांत का कार्यकाल
सूर्यकांत ने 24 नवंबर 2025 को भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। इससे पहले वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे। अपने इंटरव्यू में उन्होंने न्यायपालिका को संविधान के प्रति जवाबदेह और लंबित मामलों के समाधान को प्राथमिकता देने वाली संस्था के रूप में रेखांकित किया।




