नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026 : भारतीय सेना के सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप पांडे ने भारत की शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बयान व्यक्त किया है। लेफ्टिनेंट जनरल देवेंद्र प्रताप ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पोस्ट साझा कर अपनी राय जाहिर की है। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा प्रणाली की नकल करने के बजाय चीन से सीखने की जरूरत बताई है। उनके इस बयान के बाद शिक्षा व्यवस्था और उसके मॉडल को लेकर बहस एक बार तेज हो गई है।
पश्चिमी शिक्षा मॉडल पर उठाए सवाल
लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करते हुए कहा कि भारत को अपनी सभ्यता आधारित शिक्षा व्यवस्था को लेकर हीनभावना से बचना चाहिए। उन्होंने पश्चिमी शिक्षा प्रणाली की नकल करने के बजाय चीन के शिक्षा मॉडल से सीख लेने की बात कही। उनका तर्क है कि अगर भारत अपनी पारंपरिक और सभ्यता आधारित शिक्षा व्यवस्था में धार्मिक विचारों के शामिल होने की आशंका के कारण उससे दूरी बनाता है, तो पश्चिमी मॉडल की सीधी नकल करना भी उचित विकल्प नहीं हो सकता।
चीन का उदाहरण क्यों दिया ?
डीपी पांडे ने जिस पोस्ट को साझा किया, उसमें लैटिन अमेरिका और चीन की शिक्षा व्यवस्था की तुलना करते हुए शिक्षा को किसी देश के सामाजिक और विकासात्मक नजरिए को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया था। इसी संदर्भ में पूर्व सैन्य अधिकारी ने भारत के लिए चीन के अनुभवों से सीखने की जरूरत पर जोर दिया। हालांकि, यह उनका व्यक्तिगत विचार है और इसे किसी आधिकारिक सरकारी नीति के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
शिक्षा को लेकर देश में पहले से चल रही बहस
यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब भारत में शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों पर लगातार बहस चल रही है। हाल के छात्र आंदोलनों और परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, परीक्षा प्रणाली और युवाओं की चिंताओं को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ऐसे माहौल में डीपी पांडे की टिप्पणी ने शिक्षा के भारतीय मॉडल, पश्चिमी प्रभाव और चीन के शिक्षा तंत्र को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया है।
क्या भारत को चीन से सीखना चाहिए ?
भारत और चीन की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए किसी दूसरे देश की शिक्षा व्यवस्था को सीधे अपनाने के बजाय उसके सफल पहलुओं का अध्ययन करना अधिक उपयोगी हो सकता है। डीपी पांडे की टिप्पणी का मुख्य संदेश यही है कि भारत को अपनी शिक्षा व्यवस्था को लेकर आत्मविश्वास के साथ दूसरे देशों के अनुभवों से सीखने की जरूरत है। अब देखना होगा कि शिक्षा मॉडल को लेकर यह बहस आगे किस दिशा में जाती है।




