नई दिल्ली, 19 अगस्त 2026 : सुप्रीम कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के अधिकारों को लेकर बुधवार को एक अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीनियर सिटीजन्स अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल करा सकते हैं, अगर ऐसा उनके भरण-पोषण, सुरक्षा और गरिमा की रक्षा के लिए जरूरी हो। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना कानून का प्रमुख उद्देश्य है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि किसी समाज की सभ्यता का आकलन इस बात से किया जा सकता है कि वह बुजुर्गों को कितना सम्मान, संरक्षण व सुरक्षा देता है।

लखनऊ के मकान से जुड़ा है मामला

यह मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की एक याचिका से जुड़ा था। गुप्ता ने पांच जून 2022 को अपने बेटे को मकान से बेदखल करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन किया था। बताया गया कि मकान गुप्ता की स्वयं खरीदी हुई संपत्ति थी। मामला उस समय गंभीर हुआ, जब उनकी 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। SDM ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने नौ अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखा और बेटे व बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था बेदखली का आदेश

बेटे और बहू ने SDM और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के दोनों आदेश रद्द कर दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि अगर बुजुर्ग माता-पिता के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए बच्चों को संपत्ति से बाहर करना जरूरी है, तो ट्रिब्यूनल ऐसा आदेश दे सकता है। कोर्ट ने 2007 के कानून की धाराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि एक्ट की धारा 7 के तहत ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं और धारा 8 उन्हें सिविल कोर्ट जैसी कुछ शक्तियां प्रदान करती है। वहीं, धारा 27 सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक कानून के उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए ट्रिब्यूनल जरूरी राहत देने की शक्ति रखता है।

बुजुर्गों की गरिमा कानून का केंद्र

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2007 का कानून इस उद्देश्य से बनाया गया है कि बढ़ती उम्र उपेक्षा, असुरक्षा और अपमान का पर्याय न बन जाए। शीर्ष कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 41 का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य व समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

पहले के फैसलों का भी दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर मामले में 2021 के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में तीन जजों की पीठ ने कहा था कि वरिष्ठ नागरिकों या माता-पिता के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। अदालत ने बताया कि यही सिद्धांत बाद के समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025) और कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025) मामलों में भी दोहराया गया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे बुजुर्ग माता-पिता के लिए अहम माना जा रहा है, जिन्हें अपनी ही संपत्ति में बच्चों या अन्य परिजनों की वजह से उपेक्षा, असुरक्षा या परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।