अंकारा/तेल अवीव/नई दिल्ली: पाकिस्तान और तुर्की के बीच बढ़ते सैन्य सहयोग के बीच NATO के Article-5 को लेकर एक नई रणनीतिक बहस सामने आ गई है। एक रिपोर्ट में इजरायली रणनीतिक विश्लेषण का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था हर उस स्थिति में स्वतः लागू नहीं होती, जहां किसी सदस्य देश की सेना अपनी राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर तैनात हो। यह चर्चा ऐसे समय में सामने आई है, जब तुर्की और पाकिस्तान के सैन्य संबंध लगातार मजबूत होने की खबरें आ रही हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि Article-5 की व्याख्या और किसी संभावित सैन्य कार्रवाई पर अंतिम निर्णय परिस्थितियों और NATO देशों की राजनीतिक प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
क्या है NATO का Article-5 ?
NATO का Article-5 सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर आधारित है। इसके तहत किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे पूरे गठबंधन पर हमला माना जा सकता है और सदस्य देश सहायता के लिए कदम उठा सकते हैं, लेकिन Article-5 का लागू होना परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किसी घटना को Article-5 के दायरे में लाने के लिए NATO सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होती है।
तुर्की की विदेशों में तैनाती पर क्यों हो रही चर्चा ?
रिपोर्ट में इजरायली रणनीतिकारों के विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा गया है कि अगर तुर्की की सेना सीरिया या किसी दूसरे देश में तैनात है तो वहां उसके खिलाफ होने वाली कार्रवाई को स्वतः तुर्की की अपनी सीमा पर हमला नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि अगर भविष्य में तुर्की पाकिस्तान में सैनिक, सैन्य सलाहकार या अन्य सैन्य संसाधन तैनात करता है और भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष होता है तो क्या ऐसी स्थिति में NATO Article-5 स्वतः सक्रिय होगा ? इसका कोई सीधा और सार्वभौमिक जवाब नहीं है। NATO की प्रतिक्रिया वास्तविक परिस्थितियों, हमले की प्रकृति और सदस्य देशों के फैसलों पर निर्भर करेगी।
सीरिया में इजरायल-तुर्की तनाव का उदाहरण
रिपोर्ट में सीरिया के अबू अल-दुहूर एयरबेस पर इजरायली हमले का जिक्र किया गया है। दावा है कि एयरबेस पर हमला उस समय किया गया, जब वहां तुर्की की सेना या सैन्य उपकरण मौजूद नहीं थे। इजरायल व तुर्की के बीच सीरिया को लेकर रणनीतिक मतभेद पहले से हैं। ऐसे में किसी संभावित तुर्की सैन्य तैनाती से पहले सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की रणनीति पर भी चर्चा हो रही है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब ?
भारत के नजरिए से यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग बढ़ रहा है। तुर्की पाकिस्तान को ड्रोन और अन्य सैन्य तकनीक उपलब्ध कराने वाले देशों में शामिल है। अगर भविष्य में किसी संघर्ष की स्थिति में तुर्की सीधे पाकिस्तान में सैन्य मौजूदगी दर्ज कराता है, तो यह भारत के लिए एक नई रणनीतिक चुनौती बन सकती है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि ऐसी स्थिति में NATO निश्चित रूप से हस्तक्षेप नहीं करेगा। किसी भी संभावित संघर्ष में NATO की प्रतिक्रिया केवल Article-5 के कानूनी प्रावधान पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि सदस्य देशों की राजनीतिक सहमति और उस समय की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होंगी।
NATO Article-5 को लेकर क्या है असली सवाल ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि तुर्की की सीमा के बाहर मौजूद उसकी सैन्य संपत्तियों पर हमला होने की स्थिति में NATO किस तरह प्रतिक्रिया देगा ? यही वह मुद्दा है जिस पर रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच बहस चल रही है। फिलहाल भारत, पाकिस्तान और तुर्की के बीच ऐसा कोई सैन्य संघर्ष नहीं है जिसमें Article-5 लागू होने की स्थिति सामने आई हो। इसलिए भविष्य की किसी संभावित स्थिति को लेकर किए जा रहे दावों को रणनीतिक विश्लेषण और संभावनाओं के रूप में ही देखना चाहिए।




