काठमांडू, 22 अगस्त 2026 : नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान से जोड़ने का प्रस्ताव पारित होने के बाद यह मुद्दा और गरमा गया है। इस सम्मेलन में ‘मैं हिंदू हूं’ जैसे नारे भी लगाए गए। देउबा ने कहा कि वह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उन्हें गर्व के साथ अपनी हिंदू पहचान बताने का अधिकार चाहिए। हालांकि प्रस्ताव में केवल हिंदू पहचान की बात नहीं की गई है। इसमें सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के साथ-साथ हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित परंपराओं के संरक्षण पर भी जोर दिया गया है।
संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की मांग
नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग करने वाले संगठनों ने अब संविधान संशोधन को संभावित रास्ते के तौर पर देखना शुरू कर दिया है। विश्व हिंदू परिषद नेपाल की ओर से सरकार को एक प्रस्ताव सौंपे जाने की बात सामने आई है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 4 से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की मांग की गई है। वहीं, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP) भी संविधान संशोधन की संभावित बहस में हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को शामिल करने की मांग कर रही है। नेपाल वर्ष 2015 में लागू संविधान के बाद एक धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना था। ऐसे में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में बदलाव की मांग स्वाभाविक तौर पर देश की राजनीति में एक बड़ा संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
बालेन शाह के सामने बड़ी चुनौती
अब सबसे ज्यादा नजर बालेन शाह सरकार के रुख पर है। संविधान में व्यापक बदलाव को लेकर चल रही प्रक्रिया के बीच हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठनों ने इस मुद्दे को भी संवैधानिक बहस में शामिल कराने की कोशिश तेज कर दी है। RPP के नेताओं ने प्रधानमंत्री बालेन शाह से मुलाकात कर व्यापक संविधान संशोधन में नेपाल की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा की मांग रखी है। हालांकि, हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर सरकार का अंतिम रुख क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में संसद, राजनीतिक दलों और सरकार के बीच होने वाली चर्चा इस मुद्दे की दिशा तय कर सकती है।
युवाओं और ऑनलाइन अभियानों से बढ़ी मांग
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग कोई नई नहीं है, लेकिन हाल के राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों के बीच इसे नए सिरे से समर्थन मिलने की बात सामने आ रही है। युवाओं की भागीदारी और सोशल मीडिया अभियानों ने भी इस मुद्दे को व्यापक चर्चा में ला दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग कितनी मजबूत होती है, बल्कि यह भी है कि क्या बालेन शाह सरकार संविधान में धर्मनिरपेक्षता से जुड़े प्रावधानों में बदलाव की बहस को आगे बढ़ने देगी ? आने वाले दिनों में नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा सरकार, विपक्ष और अलग-अलग धार्मिक-सामाजिक समूहों के बीच एक अहम बहस का केंद्र बन सकता है।




