नई दिल्ली, 23 अगस्त। बारिश के मौसम में छत से पानी टपकना और दीवारों पर सीलन आना आम समस्या है। कई बार कमरे की छत पर पानी का निशान दिखाई देता है, लेकिन रिसाव की असली जगह कहीं और होती है। ऐसे में बिना जांच के मरम्मत शुरू करने से समस्या दोबारा सामने आ सकती है। इसलिए सबसे पहले लीकेज का स्रोत पहचानना और फिर सही तरीके से रिपेयर करना जरूरी है।

सबसे पहले लीकेज की असली जगह पहचानें

कमरे की छत पर जहां पानी का निशान दिख रहा है, जरूरी नहीं कि रिसाव वहीं से हो। पानी कंक्रीट के अंदर से दूसरी जगह तक पहुंच सकता है। छत पर बारीक दरारों, पैरापेट की दीवार, ड्रेन और पानी जमा होने वाले हिस्सों को ध्यान से जांचें। जरूरत पड़ने पर छोटे हिस्सों में पानी डालकर भी लीकेज का स्रोत खोजा जा सकता है।

छोटी दरारों को तुरंत करें सील

छत पर दिखाई देने वाली छोटी दरारों को नजरअंदाज न करें। मरम्मत से पहले दरार से धूल और ढीले कण साफ करें। इसके बाद उपयुक्त क्रैक फिलर या सीलेंट लगाया जा सकता है। जरूरत के अनुसार ऊपर वॉटरप्रूफ कोटिंग भी की जा सकती है।

पैरापेट और ड्रेन पर रखें खास नजर

छत और पैरापेट की दीवार का जोड़ अक्सर पानी के रिसाव की वजह बनता है। इसी तरह ड्रेन के आसपास पानी जमा होने या पुरानी सीलिंग खराब होने से भी लीकेज शुरू हो सकती है। इन हिस्सों की नियमित जांच और सफाई जरूरी है, ताकि पानी लंबे समय तक जमा न रहे।

पुरानी वॉटरप्रूफिंग पर सीधे नई कोटिंग न करें

अगर छत पर पहले से वॉटरप्रूफिंग लगी है और वह उखड़ रही है, फूल रही है या उसके नीचे नमी है, तो पहले खराब परत हटाकर सतह को तैयार करना चाहिए। इसके बाद ही नई कोटिंग करना बेहतर रहेगा।

कब विशेषज्ञ की जरूरत है?

अगर दरार चौड़ी या गहरी हो, लगातार बढ़ रही हो या छत की मजबूती पर सवाल उठ रहे हों, तो खुद मरम्मत करने के बजाय इंजीनियर या विशेषज्ञ से जांच कराएं। वहीं, कई जगहों से लगातार पानी आने पर पूरी छत की वॉटरप्रूफिंग की जरूरत पड़ सकती है। मरम्मत के बाद सीलेंट और कोटिंग को पर्याप्त समय तक सूखने दें।