देवघर, 18 अगस्त: देवघर जिले का घोरमारा इलाका इन दिनों श्रावणी मास मेले के कारण श्रद्धालुओं की चहल-पहल से गुलजार है। बाबा बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ में पूजा-अर्चना के बाद लौटने वाले कांवरिया घोरमारा पहुंचकर यहां के प्रसिद्ध पेड़े का स्वाद जरूर लेते हैं। यही वजह है कि घोरमारा की पहचान अब सिर्फ एक पड़ाव के रूप में नहीं, बल्कि ‘पेड़ा नगरी’ के नाम से भी होने लगी है।

सुखाड़ी मंडल पेड़ा भंडार ने बनाई खास पहचान

घोरमारा के पेड़ा कारोबार की चर्चा होती है तो सुखाड़ी मंडल पेड़ा भंडार का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, घोरमारा को पेड़ा नगरी के रूप में पहचान दिलाने में सुखाड़ी मंडल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। करीब पांच दशक पहले उन्होंने बेहद छोटे स्तर से पेड़ा बनाने और बेचने का काम शुरू किया था।

बताया जाता है कि शुरुआती दौर में सुखाड़ी मंडल महज एक किलो पेड़ा तैयार करते थे और उसे बेचने में कई दिन लग जाते थे। धीरे-धीरे लोगों को उनके बनाए पेड़े का स्वाद पसंद आने लगा और कारोबार बढ़ता गया। समय के साथ यह छोटी शुरुआत घोरमारा की पहचान से जुड़ गई।

चार दिन में बिकता था एक किलो पेड़ा

सुखाड़ी मंडल के परिवार के मुताबिक, लगभग 50 वर्ष पहले एक किलो पेड़ा तैयार कर उसे बेचने में करीब चार दिन लग जाते थे। उस समय कारोबार बहुत छोटा था, लेकिन गुणवत्ता और स्वाद के कारण ग्राहकों का भरोसा लगातार बढ़ता गया। बाद में श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच घोरमारा के पेड़े की मांग बढ़ने लगी।

पिता की मेहनत को आगे बढ़ा रहे बेटे

सुखाड़ी मंडल के बेटे रोहित कुमार मंडल बताते हैं कि उनके पिता ने घोरमारा को पेड़ा नगरी की पहचान दिलाने के लिए वर्षों तक मेहनत की। उनका कहना है कि आज श्रावणी मेले के दौरान बड़ी संख्या में कांवरिया यहां पेड़ा खरीदते हैं और इसे अपने साथ लेकर जाते हैं।

घोरमारा का यह पेड़ा कारोबार अब स्थानीय अर्थव्यवस्था और धार्मिक पर्यटन से भी जुड़ चुका है। श्रावणी मेले में श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ के बीच यहां की दुकानों पर पेड़ा खरीदने वालों की भी अच्छी-खासी भीड़ देखी जा रही है। पांच दशक पहले शुरू हुई यह छोटी-सी कोशिश आज घोरमारा की खास पहचान बन चुकी है।