पश्चिम चम्पारण (बिहार) 7 अगस्त 2026।

रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच जैविक खेती किसानों के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़ और बेसन से तैयार की गई जैविक खाद मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के साथ फसलों के बेहतर विकास में मदद कर सकती है।

जैविक खाद क्यों है फायदेमंद ?

विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी तरह सड़ा और तैयार किया गया गोबर खेत की मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाता है। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है और सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है, जो पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके नियमित उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम की जा सकती है।

ऐसे तैयार करें देसी जैविक खाद

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जैविक खाद तैयार करने के लिए निम्न सामग्री का उपयोग किया जा सकता है :

15 किलोग्राम ताजा गाय का गोबर

15 लीटर गौमूत्र

एक किलोग्राम बेसन

एक किलोग्राम गुड़

आवश्यकतानुसार पानी

इन सभी सामग्रियों को एक बड़े ड्रम में डालकर अच्छी तरह मिलाएं। इसके बाद ड्रम में पानी भर दें और लकड़ी के डंडे से मिश्रण को अच्छी तरह चलाएं। मिश्रण को कुछ दिनों तक ढककर रखें ताकि उसमें प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया शुरू हो सके।

खाद तैयार करते समय रखें ये सावधानियां

ड्रम को सीधे धूप में न रखें।

इसे किसी छायादार स्थान या पेड़ के नीचे रखें।

समय-समय पर मिश्रण को चलाते रहें।

जैविक सूक्ष्मजीवों के विकास के बाद यह मिश्रण अधिक प्रभावी खाद में बदल जाता है।

फसलों को मिल सकते हैं बेहतर परिणाम

विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार तैयार जैविक खाद का उपयोग धान, गेहूं, गन्ना, सब्जियों और अन्य फसलों में किया जा सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, पौधों की वृद्धि को बेहतर करने और फसल की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलती है। हालांकि उत्पादन में वृद्धि कई कारकों—जैसे मिट्टी की स्थिति, सिंचाई, मौसम और खेती की तकनीक—पर निर्भर करती है, इसलिए "तीन गुना पैदावार" जैसे दावों को सभी परिस्थितियों में निश्चित परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।

जैविक खेती की ओर बढ़ रहा रुझान

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए जैविक खाद का उपयोग लाभकारी हो सकता है। इससे खेती की लागत कम करने, मिट्टी की उत्पादकता बनाए रखने और पर्यावरण संरक्षण में भी सकारात्मक योगदान मिलता है। किसान अपनी स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर इस तकनीक को अपनाएं।