पटना, 11 अगस्त 2026 : रक्षा तकनीक के क्षेत्र में बिहार के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है। NIT पटना की एक रिसर्च टीम ऐसी खास मेटेरियल लेयर विकसित करने पर काम कर रही है, जो फाइटर जेट और मिसाइलों को दुश्मन के रडार से बचाने में मदद कर सकती है। इस तकनीक का उद्देश्य रडार से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल के प्रभाव को कम करना और लक्ष्य से वापस लौटने वाले सिग्नल को कमजोर करना है। करीब छह वर्षों से चल रहे शोध के तहत ऐसी पतली और हल्की लेयर विकसित करने पर काम किया जा रहा है, जिसे भविष्य में विमान और मिसाइलों की बाहरी सतह पर इस्तेमाल किया जा सके। हालांकि किसी रक्षा प्रणाली में इसका वास्तविक इस्तेमाल परीक्षण और जरूरी मानकों को पूरा करने के बाद ही संभव होगा।
कैसे काम करता है दुश्मन का रडार ?
आधुनिक युद्ध में रडार किसी विमान या मिसाइल का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल भेजता है। ये सिग्नल किसी वस्तु से टकराकर वापस रडार की ओर लौटते हैं। लौटने वाले सिग्नल का विश्लेषण करके रडार लक्ष्य की स्थिति, दिशा और गति का अनुमान लगा सकता है। तेज गति से उड़ने वाले विमान और मिसाइलों की पहचान में डॉप्लर प्रभाव भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही वजह है कि रडार की निगरानी से बचना आधुनिक सैन्य तकनीक की बड़ी चुनौतियों में शामिल है।
NIT पटना की खास लेयर क्या करेगी ?
NIT पटना में विकसित की जा रही विशेष मेटेरियल लेयर को इस तरह डिजाइन करने पर काम किया जा रहा है कि यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों के साथ नियंत्रित तरीके से प्रतिक्रिया करे। इसका उद्देश्य रडार से आने वाली तरंगों को अवशोषित करने या उनकी दिशा में बदलाव लाने में मदद करना है। इससे लक्ष्य से वापस रडार तक पहुंचने वाला सिग्नल कमजोर हो सकता है। नतीजतन, रडार के लिए विमान या मिसाइल की पहचान और ट्रैकिंग मुश्किल होने की संभावना है।
फाइटर जेट और मिसाइल की बाहरी सतह पर इस्तेमाल की तैयारी
शोध के अहम हिस्सों में इस लेयर को फाइटर जेट और मिसाइल की बाहरी सतह पर इस्तेमाल करने की संभावना भी शामिल है। इसके लिए सामग्री को हल्का और बेहद पतला रखने पर ध्यान दिया जा रहा है। किसी भी सैन्य विमान या मिसाइल में अतिरिक्त वजन उसकी क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी तकनीक विकसित करना चुनौतीपूर्ण है, जो एक तरफ रडार सिग्नल को कमजोर करे और दूसरी तरफ विमान या मिसाइल की मूल कार्यक्षमता पर प्रतिकूल असर न डाले।
छह साल से चल रहा है शोध
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस तकनीक पर करीब छह साल से रिसर्च और प्रयोग किए जा रहे हैं। शोध का उद्देश्य ऐसी स्वदेशी सामग्री विकसित करना है, जिसका भविष्य में रक्षा प्रणालियों में उपयोग किया जा सके। हालांकि, किसी भी रक्षा तकनीक को सीधे सैन्य इस्तेमाल में लाने से पहले उसके प्रदर्शन, टिकाऊपन और सुरक्षा से जुड़े कई चरणों में परीक्षण जरूरी होते हैं। इसलिए फिलहाल इसे शोध और विकास के चरण में ही देखा जाना चाहिए।
भारत की रक्षा क्षमता के लिए क्यों अहम है यह रिसर्च ?
अगर परीक्षणों में यह तकनीक अपेक्षित परिणाम देती है, तो भविष्य में इसका इस्तेमाल रडार आधारित निगरानी से बचाव की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। इससे देश में विकसित स्वदेशी रक्षा तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा। NIT पटना की यह रिसर्च आत्मनिर्भर रक्षा तकनीक की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। खास तौर पर ऐसी सामग्री विकसित करने की क्षमता, जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल को नियंत्रित कर सके, भारत के एयरोस्पेस और डिफेंस रिसर्च क्षेत्र के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।




