पटना, 10 अगस्त 2026 : बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एनडीए के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक बार फिर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से शराबबंदी कानून के मौजूदा स्वरूप पर पुनर्विचार करने की मांग की है। जीतन राम मांझी का कहना है कि बिहार में शराबबंदी जारी रहनी चाहिए, मगर इसे गुजरात मॉडल की तर्ज पर लागू करने पर विचार किया जा सकता है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) की युवा इकाई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मांझी ने शराबबंदी कानून को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि नशाबंदी का उद्देश्य अपनी जगह सही है, लेकिन इसके लागू होने के दौरान पुलिस और प्रशासन के स्तर पर कुछ समस्याएं सामने आती हैं। ऐसे में सरकार को व्यवस्था की समीक्षा करनी चाहिए।
मांझी ने क्या दिया गुजरात मॉडल का उदाहरण ?
जीतन राम मांझी ने गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी शराबबंदी लागू है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में तय नियमों और परमिट व्यवस्था के तहत शराब की अनुमति दी जाती है। मांझी का सुझाव है कि बिहार में भी इसी तरह की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। उनका तर्क है कि एक ऐसी नीति बनाई जाए, जिसमें कानून का पालन भी हो और निर्धारित नियमों के तहत सीमित छूट की संभावना भी रहे। उनका यह भी कहना रहा है कि सख्त शराबबंदी के कारण अवैध शराब के कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है, जिसका असर आम लोगों पर पड़ता है।
पहली बार नहीं उठाई है मांग
शराबबंदी में बदलाव की मांग जीतन राम मांझी पहले भी करते रहे हैं। वर्ष 2022 में उन्होंने बिहार में गुजरात की परमिट व्यवस्था जैसा मॉडल लागू करने की वकालत की थी। इसके बाद 2023 में गुजरात के GIFT City में शराब सेवन को लेकर सीमित छूट दिए जाने के बाद भी जीतन राम मांझी ने बिहार में इसी तरह की व्यवस्था पर विचार करने की बात कही थी। जीतन राम मांझी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि शराबबंदी के मौजूदा मॉडल में अवैध शराब के कारोबार और इसके खिलाफ कार्रवाई से जुड़े कई सवाल सामने आते हैं। वह खास तौर पर गरीब और कमजोर वर्गों पर कार्रवाई को लेकर भी चिंता जाहिर करते रहे हैं।
CM सम्राट चौधरी का रुख क्या है ?
जीतन राम मांझी की मांग के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का रुख शराबबंदी को लेकर पहले से स्पष्ट रहा है। मुख्यमंत्री ने बिहार में शराबबंदी जारी रखने की बात कही है और इसमें किसी तरह की छूट देने से इनकार किया है। बिहार सरकार की ओर से अवैध और जहरीली शराब के कारोबार के खिलाफ सख्त कार्रवाई पर भी जोर दिया जाता रहा है। ऐसे में मांझी की मांग और सरकार के मौजूदा रुख के बीच अंतर साफ नजर आता है।
NCAER की रिपोर्ट के बाद फिर चर्चा में शराबबंदी
बिहार की शराबबंदी नीति को लेकर हाल में एक शोध रिपोर्ट के बाद भी बहस तेज हुई है। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के शोध में शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर चर्चा की गई है। रिपोर्ट में शराबबंदी के घोषित सामाजिक उद्देश्यों और इसके वास्तविक प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसमें अवैध शराब और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल से जुड़े पहलुओं का भी उल्लेख किया गया है। शराबबंदी हटाने की स्थिति में संभावित राजस्व और सरकारी खर्च से जुड़े मुद्दों पर भी शोध में चर्चा की गई है।
अब सरकार के सामने क्या विकल्प ?
जीतन राम मांझी की ताजा मांग ने बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस को हवा दे दी है। एक तरफ मांझी गुजरात मॉडल की तर्ज पर मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी शराबबंदी जारी रखने के पक्ष में अपना रुख स्पष्ट कर चुके हैं। ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि बिहार सरकार मांझी के सुझाव पर कोई चर्चा करती है या शराबबंदी की मौजूदा नीति को ही आगे जारी रखती है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा NDA के भीतर भी चर्चा का विषय बन सकता है।




