पटना | 7 अगस्त 2026
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। लेकिन बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने एक बार फिर नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। प्रशांत किशोर की जीत के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या बिहार में यादव और कुर्मी वोट बैंक के बीच की पुरानी दूरी कम हो रही है ? क्या नीतीश कुमार का चर्चित 'लव-कुश समीकरण' कमजोर पड़ रहा है या यह सिर्फ एक चुनाव तक सीमित बदलाव है ?
बांकीपुर में दिखा यादव-कुर्मी वोट का मेल
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर को यादव और कुर्मी दोनों समुदायों से समर्थन मिलने की चर्चा रही। इससे राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा कि क्या बिहार में नया सामाजिक समीकरण आकार ले रहा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक विधानसभा चुनाव के आधार पर पूरे राज्य की राजनीति का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी।
कैसे बना था 'लव-कुश' समीकरण ?
बिहार की राजनीति में 1990 के दशक के बाद पिछड़ा वर्ग की राजनीति काफी मजबूत हुई। इसी दौर में यादव और कुर्मी नेताओं का प्रभाव बढ़ा। नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव कभी एक साथ राजनीति करते थे, लेकिन बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद बिहार में लव-कुश समीकरण (कुर्मी और कुशवाहा) एनडीए की राजनीति का बड़ा आधार बना। यह समीकरण लालू यादव के MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के जवाब के रूप में देखा जाता रहा।
क्या नीतीश कुमार से नाराज हैं कुर्मी वोटर ?
बांकीपुर उपचुनाव ऐसे समय हुआ जब नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने को लेकर कुर्मी समाज में नाराजगी की चर्चा थी। इसके अलावा जेडीयू के नेतृत्व को लेकर भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाएं चलती रहीं। इसी नाराजगी का फायदा प्रशांत किशोर की जन सुराज को मिलने की बात कही जा रही है।
क्या यादव-कुर्मी एक साथ आ सकते हैं ?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बांकीपुर का परिणाम तत्कालीन परिस्थितियों का असर हो सकता है। हालांकि बिहार की राजनीति में नए गठबंधन और नए सामाजिक समीकरण बनना कोई नई बात नहीं है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, कुर्मी समाज फिलहाल नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश कर सकता है, लेकिन इसका स्थायी असर आने वाले चुनावों में ही साफ होगा।
आगे की राह होगी अहम
बांकीपुर उपचुनाव ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस जरूर शुरू कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि क्या यह नया समीकरण सिर्फ उपचुनाव तक सीमित रहता है या आने वाले विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक बदलाव बनता है।




