इस्लामाबाद, 29 अगस्त 2026 : पाकिस्तान के आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में डायमर-भाषा बांध को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। लीक हुए सरकारी मेमो के मुताबिक शहबाज शरीफ सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान में बन रहे डायमर-भाषा बांध के 4,500 मेगावाट वाले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया है। पाकिस्तान सरकार की ओर से इसके पीछे देश में अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता को वजह बताया जा रहा है। मगर इस फैसले को लेकर पाकिस्तान में सवाल भी उठने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब देश बिजली संकट, महंगे ईंधन व वित्तीय दबाव से जूझ रहा है, तब बड़ी जलविद्युत परियोजना के पावर कंपोनेंट को रोकना हैरान करने वाला फैसला है। इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के अंदर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
क्या है डायमर-भाषा बांध विवाद ?
डायमर-भाषा बांध पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में स्थित एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। यह क्षेत्र भारत के अनुसार पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले क्षेत्र का हिस्सा है। परियोजना को लेकर भारत पहले ही आपत्ति दर्ज करा चुका है। इस प्रोजेक्ट में चीन की भी बड़ी भूमिका है। वर्ष 2020 में बांध के मुख्य निर्माण कार्य के लिए करीब 442 अरब पाकिस्तानी रुपये का ठेका एक संयुक्त उद्यम को दिया गया था। इसमें चीनी कंपनी चाइना पावर की 70 प्रतिशत हिस्सेदारी और पाकिस्तान की फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन की 30 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई गई थी। विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे संस्थानों ने भी परियोजना को लेकर वित्तीय समर्थन देने से दूरी बनाई थी।
सरकार ने बिजली उत्पादन वाला हिस्सा क्यों रोका ?
लीक दस्तावेजों के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार का तर्क है कि देश में पहले से ही पर्याप्त बिजली उत्पादन क्षमता मौजूद है। इसी वजह से फिलहाल बांध को मुख्य रूप से जल भंडारण परियोजना के तौर पर आगे बढ़ाने की बात कही जा रही है। सरकार का कहना है कि 4,500 मेगावाट वाले हाइड्रोपावर कॉम्प्लेक्स को बाद में विकसित किया जा सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक बाद में पावर इंफ्रास्ट्रक्चर जोड़ना तकनीकी और आर्थिक रूप से काफी मुश्किल हो सकता है।
इंजीनियरों ने बताई बड़ी तकनीकी चुनौती
जलविद्युत विशेषज्ञों का कहना है कि बांध निर्माण के दौरान ही बिजली उत्पादन से जुड़ी कई महत्वपूर्ण संरचनाएं तैयार करना ज्यादा आसान होता है। इनमें इनटेक इंटरफेस, आइसोलेशन गेट, टनल स्टब और अन्य जलमार्ग संरचनाएं शामिल हैं। अगर जलाशय भरने के बाद इन संरचनाओं को जोड़ा जाता है तो काम काफी जोखिम भरा और महंगा हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसी स्थिति में पानी के भीतर खुदाई या विशेष तकनीकी प्रक्रिया की जरूरत पड़ सकती है।
IPP लॉबी पर भी उठे सवाल
इस फैसले के बाद पाकिस्तान में स्वतंत्र बिजली उत्पादकों यानी IPP कंपनियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ जानकारों और पूर्व सैन्य अधिकारियों का आरोप है कि पावर प्रोजेक्ट रोकने से निजी बिजली उत्पादकों को फायदा हो सकता है। आलोचकों का तर्क है कि पाकिस्तान एक तरफ बिजली की कमी और महंगे ईंधन की समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश के संभावित सस्ते जलविद्युत स्रोतों को विकसित करने की गति धीमी की जा रही है। हालांकि, IPP लॉबी के दबाव से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
चीन के लिए भी बड़ा झटका?
डायमर-भाषा बांध में चीन की महत्वपूर्ण भागीदारी को देखते हुए बिजली उत्पादन वाले हिस्से को रोकने का फैसला चीन-पाकिस्तान आर्थिक सहयोग के लिहाज से अहम माना जा रहा है। परियोजना पहले से ही वित्तीय, राजनीतिक व रणनीतिक विवादों में घिरी रही है। अब 4,500 मेगावाट के पावर कंपोनेंट पर रोक की खबर ने पाकिस्तान की ऊर्जा नीति और परियोजना की व्यवहारिकता पर बहस छेड़ दी है। फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि पाकिस्तान भविष्य में इस पावर प्रोजेक्ट को दोबारा शुरू करता है या डायमर-भाषा बांध को लंबे समय तक जल भंडारण परियोजना तक सीमित रखता है।




