लंदन, 29 अगस्त 2026 : भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव को लेकर विकसित व विकासशील देशों के बीच समान जिम्मेदारी की जरूरत पर जोर दिया है। लंदन स्थित कॉमनवेल्थ सचिवालय में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जिन औद्योगिक देशों ने अपने विकास के दौरान लंबे समय तक कोयले और तेल पर निर्भरता रखी, उन्हें अब विकासशील देशों से तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की अपेक्षा करते समय परिस्थितियों का भी ध्यान रखना चाहिए। इस बीच CJI सूर्यकांत ने 'क्लाइमेट जस्टिस पर पॉलिसी डायलॉग' के दौरान 56 देशों के साझा मंच को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव बहुत जरूरी है, मगर यह प्रक्रिया न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और साझा जिम्मेदारी के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। इससे सभी देशों को लाभ मिलेगा।
'दो सदियां कोयले और तेल पर निर्भर रहे'
CJI सूर्यकांत ने कहा कि आज विकासशील देशों से कम समय में रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ने की उम्मीद की जाती है। ऐसा नहीं करने पर कई बार इन देशों की आलोचना भी होती है। उन्होंने कहा कि जो देश आज तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने की वकालत कर रहे हैं, उन्होंने अपने औद्योगिक विकास के दौरान करीब दो सदियों तक कोयले और तेल जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता रखी।उनके मुताबिक, विकासशील देशों की परिस्थितियां अलग हैं और उन्हें एक जैसी समयसीमा में ऊर्जा परिवर्तन के लिए मजबूर करना व्यावहारिक नहीं हो सकता।
क्लीन एनर्जी के लिए कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम की जरूरत
CJI ने स्वच्छ ऊर्जा के लिए जरूरी खनिज संसाधनों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कॉमनवेल्थ देशों का क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन कॉपर, कोबाल्ट और लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों पर निर्भर करता है। इन खनिजों के बड़े पैमाने पर खनन से पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर असर पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया में पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
'जलवायु न्याय और साझा जिम्मेदारी में संतुलन जरूरी'
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दुनिया के सामने चुनौती केवल तेजी से स्वच्छ ऊर्जा अपनाने की नहीं है, बल्कि इस बदलाव को न्यायसंगत तरीके से लागू करने की भी है। उन्होंने कहा कि Climate Justice के तहत तात्कालिकता के साथ-साथ निष्पक्षता और साझा जिम्मेदारी के सिद्धांतों को भी महत्व देना जरूरी है। विकासशील देशों को उनकी भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ऊर्जा परिवर्तन की राह पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
पर्यावरण संरक्षण में अदालतों की भूमिका का जिक्र
CJI सूर्यकांत ने पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका पर भी बात की। उन्होंने कहा कि भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने पर्यावरण, पारिस्थितिकी और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने जाम्बिया हाई कोर्ट के एक फैसले का उदाहरण भी दिया, जिसमें एक कॉपर माइनिंग कंपनी को पानी प्रदूषित करने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
'विकास और पर्यावरण को आमने-सामने न रखें'
CJI सूर्यकांत ने कहा कि अदालतों को जलवायु और पर्यावरण से जुड़े मामलों में दूसरे कॉमनवेल्थ देशों के उपयोगी कानूनी अनुभवों से सीखना चाहिए। हालांकि, किसी दूसरे देश के समाधान को सीधे लागू करने के बजाय उसे स्थानीय संवैधानिक, सामाजिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार ढालना जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि विकास की जायज जरूरतों और पर्यावरण संरक्षण को हमेशा एक-दूसरे के विरोधी विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जरूरत ऐसे संतुलित समाधान खोजने की है, जिनसे विकास भी जारी रहे और पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।




