नई दिल्ली/वॉशिंगटन: दुनिया में Critical Minerals और Rare Earth Elements की मांग तेजी से बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी इन खनिजों को लेकर अमेरिका, जापान और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। इसी बीच जापान के पास समुद्र की करीब छह किलोमीटर गहराई में मौजूद दुर्लभ खनिजों को निकालने की तैयारी ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। जापान के प्रशांत महासागर में स्थित मिनामितोरिशिमा द्वीप के आसपास समुद्र की गहराई में Rare Earth से भरपूर खनिजयुक्त कीचड़ मौजूद होने की बात सामने आई है। अमेरिका और जापान इन संसाधनों के दोहन को लेकर सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब दुनिया के बड़े देश भविष्य के खनिज संसाधनों के लिए समुद्र की गहराई तक जाने को तैयार हैं, तो भारत की Critical Minerals Strategy आखिर धीमी क्यों पड़ रही है ?
6 किलोमीटर नीचे छिपा है दुर्लभ खनिजों का भंडार
मिनामितोरिशिमा टोक्यो से करीब 1,600 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसके आसपास समुद्र तल से लगभग 6 किलोमीटर नीचे Rare Earth Elements से समृद्ध तलछट मिलने की जानकारी है। ये खनिज आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इलेक्ट्रिक कारों की मोटर से लेकर स्मार्टफोन, पवन टर्बाइन, मिसाइल सिस्टम और कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इनका इस्तेमाल होता है। अमेरिका और जापान के बीच सहयोग का उद्देश्य ऐसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना भी माना जा रहा है, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
Rare Earth की रेस में चीन क्यों सबसे आगे ?
Critical Minerals की वैश्विक सप्लाई चेन में चीन की भूमिका बेहद मजबूत है। खनन के अलावा रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग में भी चीन की बड़ी हिस्सेदारी है। यही वजह है कि अमेरिका, जापान, यूरोप और भारत जैसे देश अपनी वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं। Rare Earth की उपलब्धता सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं है। इनका इस्तेमाल रक्षा और हाई-टेक इंडस्ट्री में भी होता है। इसलिए इन खनिजों की सप्लाई पर नियंत्रण को रणनीतिक ताकत के तौर पर देखा जाता है।
भारत का Mineral Mission कहां अटक रहा है ?
भारत ने विदेशों में जरूरी खनिजों के स्रोत हासिल करने के लिए Khanij Bidesh India Limited यानी KABIL की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य विदेशों में रणनीतिक और महत्वपूर्ण खनिजों की पहचान, अधिग्रहण, विकास, खनन और प्रोसेसिंग से जुड़ी परियोजनाओं को आगे बढ़ाना है। लेकिन विदेशों में खनिज संपत्तियां हासिल करने के मामले में भारत को अब तक सीमित सफलता मिली है। कई परियोजनाओं में अधिग्रहण और उत्पादन के बीच लंबा अंतराल देखने को मिल रहा है।
अर्जेंटीना का Lithium Project
भारत ने अर्जेंटीना में लिथियम ब्लॉक्स हासिल किए हैं। हालांकि वहां उत्पादन शुरू होने में अभी कई साल लगने की उम्मीद है। इससे भारत की Critical Minerals Supply Chain को लेकर गति पर सवाल उठते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में प्रतिस्पर्धा
ऑस्ट्रेलिया में एक महत्वपूर्ण लिथियम परियोजना हासिल करने की दौड़ में भारत को दक्षिण कोरियाई कंपनी POSCO जैसी बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना पड़ा। ऊंची बोली और अधिक वित्तीय क्षमता के कारण भारतीय पक्ष को प्रतिस्पर्धा में मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
चिली और दूसरे देशों में भी चुनौती
चिली और वियतनाम जैसे देशों में भी खनिज संपत्तियों को लेकर भारत की कोशिशों को समय और वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
भारत क्यों पिछड़ रहा है ?
भारत की मुश्किलें सिर्फ खनिजों की उपलब्धता तक सीमित नहीं हैं। विदेशों में Mining Assets हासिल करने के लिए बड़ी पूंजी, विशेषज्ञों और तेज निर्णय लेने की क्षमता की जरूरत होती है।
पहली चुनौती—पूंजी : चीन और दक्षिण कोरिया की बड़ी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़े निवेश और आक्रामक बोली लगाने की क्षमता रखती हैं।
दूसरी चुनौती—प्रक्रियागत देरी : किसी विदेशी खदान की पहचान से लेकर बोली, समझौते, मंजूरी और उत्पादन शुरू करने तक लंबा समय लग सकता है।
तीसरी चुनौती—Processing : केवल कच्चा खनिज हासिल कर लेना पर्याप्त नहीं है। उसे Battery-Grade Material या दूसरे औद्योगिक उत्पादों में बदलने के लिए मजबूत Processing और Refining क्षमता भी जरूरी है।
सबसे बड़ा खतरा : खनिज मिले, पर प्रोसेसिंग के लिए फिर चीन पर निर्भरता
भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती यही है। अगर देश विदेशों से Lithium, Rare Earth या दूसरे Critical Minerals हासिल कर लेता है, लेकिन उनके Refining और Processing के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है, तो सप्लाई चेन की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसलिए भारत के लिए Mining Assets हासिल करने के साथ घरेलू Refining, Processing, Recycling और Advanced Material Manufacturing क्षमता विकसित करना भी जरूरी है।
सरकार ने क्या बदला ?
भारत ने मार्च 2031 तक 50 विदेशी Critical Mineral Assets हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए KABIL की वित्तीय क्षमता बढ़ाने और कंपनी के पुनर्गठन की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। KABIL की अधिकृत पूंजी को 500 करोड़ से बढ़ाकर 1,000 करोड़ रुपये करने की योजना बताई गई है। इससे कंपनी को बड़े अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहणों में प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिल सकती है।
अमेरिका-जापान की तैयारी से भारत को क्या सीख ?
दुनिया Critical Minerals को सिर्फ व्यापारिक संसाधन नहीं, बल्कि रणनीतिक संपत्ति के रूप में देख रही है। अमेरिका और जापान समुद्र की अत्यधिक गहराई में मौजूद खनिजों तक पहुंच बनाने की तैयारी कर रहे हैं, वहीं चीन पहले से Mining और Processing Supply Chain में मजबूत स्थिति में है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती दोहरी है-विदेशों में खनिज संपत्तियां हासिल करना और देश के भीतर उनकी प्रोसेसिंग क्षमता तैयार करना। अगर भारत इस रेस में तेजी नहीं दिखाता है, तो भविष्य की EV, Semiconductor, Defence और Green Energy Economy के लिए जरूरी कच्चे माल में उसकी विदेशी निर्भरता बनी रह सकती है।




