नई दिल्ली | 10 जुलाई 2026
सुप्रीम कोर्ट ने ओरांव आदिवासी समुदाय की पारंपरिक विरासत व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि मान्यता प्राप्त पारंपरिक कानून के तहत कोई चाचा-ससुर अपनी भतीजी के पति को 'घर-दामाद' के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की व्यवस्था को समर्थन देने वाला कोई स्थापित और मान्य पारंपरिक नियम या प्रथा रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।
झारखंड हाईकोर्ट और निचली अदालतों के फैसले रद्द
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट, प्रथम अपीलीय अदालत और ट्रायल कोर्ट के उन फैसलों को निरस्त कर दिया, जिनमें कथित 'घर-दामाद' व्यवस्था को वैध माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों और पारंपरिक कानून की सही व्याख्या नहीं की।
क्या था पूरा विवाद?
मामला ओरांव समुदाय के सुखू ओरांव की पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। उनके तीन पुत्र थे—घुंगरू, लेदुरा और भौला। लेदुरा की बिना संतान के मृत्यु हो गई, जबकि भौला के पीछे उनकी बेटी बुधैन बचीं। वादी बेजला ओरांव, जो घुंगरू के पुत्र हैं, ने दावा किया कि सबसे निकट पुरुष रिश्तेदार होने के कारण संपत्ति पर उनका वैध अधिकार बनता है। दूसरी ओर प्रतिवादियों का कहना था कि बुधैन के पति पुनाई को लेदुरा ने 'घर-दामाद' के रूप में स्वीकार किया था, इसलिए उन्हें संपत्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि कथित 'घर-दामाद' व्यवस्था ओरांव समुदाय की मान्य पारंपरिक प्रथा के अनुरूप थी। ऐसे में केवल इस दावे के आधार पर पैतृक संपत्ति पर अधिकार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विरासत संबंधी मामलों में मान्यता प्राप्त परंपराओं और ठोस साक्ष्यों का होना आवश्यक है। इस फैसले को आदिवासी समुदायों में पारंपरिक उत्तराधिकार कानून की व्याख्या के लिहाज से एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।




