रांची | 23 जुलाई 2026
झारखंड अब केवल फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर लोकेशन नहीं रह गया है, बल्कि अपनी संस्कृति, भाषाओं और समाज की कहानियां खुद दुनिया के सामने पेश करने वाला राज्य बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में झारखंडी, संताली, नागपुरी और कुड़ुख सिनेमा ने जिस तरह अपनी अलग पहचान बनाई है, उसने राज्य को भारतीय सिनेमा के मानचित्र पर नई जगह दिलाई है।
क्षेत्रीय सिनेमा ने बनाई नई पहचान
झारखंड के फिल्मकार अब अपनी मिट्टी, परंपराओं और आदिवासी जीवन को स्थानीय भाषाओं में बड़े पर्दे पर उतार रहे हैं। रांची के वरिष्ठ फिल्मकार विनोद कुमार की फिल्म 'अक्रांत' (1988) को झारखंड के शुरुआती महत्वपूर्ण फीचर फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया और मुंबई पैनोरमा में भी जगह मिली।
अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची झारखंड की कहानियां
युवा निर्देशक निरंजन कुजूर की फिल्म 'दुई जागर' का चयन बुसान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के न्यू करंट्स सेक्शन में हुआ, जबकि संताली फिल्मकार रवि राज मुर्मू ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतकर क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाई दी। वहीं, लेखक नीरज शुक्ला ने बॉलीवुड फिल्म 'रईस' की पटकथा लिखकर अपनी अलग पहचान बनाई।
नई पीढ़ी के फिल्मकारों का दमदार योगदान
निर्देशक सतीश मुंडा ने 'जादूगोड़ा' जैसी चर्चित डॉक्यूमेंट्री और 'चक्की' जैसी फीचर फिल्म के जरिए सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वहीं एनपीके पुरुषोत्तम, लाल विजय शाहदेव, प्रवीण तिवारी, अनुज कुमार और सुरेंद्र कुजूर जैसे युवा फिल्मकार क्षेत्रीय सिनेमा को नई दिशा दे रहे हैं। प्रवीण तिवारी की फिल्म रिलीज से पहले ही कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है।
संस्कृति, रोजगार और पर्यटन को मिलेगा लाभ
फिल्म विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्रीय सिनेमा के विस्तार से झारखंड की जनजातीय संस्कृति, लोककला और पर्यटन को राष्ट्रीय एवं वैश्विक पहचान मिल रही है। साथ ही स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों, लेखकों और संगीतकारों के लिए रोजगार के नए अवसर भी तैयार हो रहे हैं।
झारखंड अब खुद कह रहा अपनी कहानी
एक समय था जब झारखंड केवल बाहरी फिल्मकारों के कैमरे का विषय बनता था, लेकिन अब राज्य के अपने निर्देशक, लेखक और कलाकार अपनी भाषा और अपनी संस्कृति के जरिए दुनिया तक अपनी आवाज पहुंचा रहे हैं। यही बदलाव झारखंड के सिनेमा को नई पहचान और नई दिशा दे रहा है।




