खरसावां | 20 जुलाई 2026
जगन्नाथ संस्कृति में रथयात्रा केवल भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की यात्रा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े प्रत्येक अनुष्ठान का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। रथयात्रा के पांचवें दिन मनाई जाने वाली हेरा पंचमी ऐसी ही एक महत्वपूर्ण परंपरा है। इस अवसर पर देवी महालक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से मिलने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और उनके समय पर वापस नहीं लौटने पर अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं। ओडिशा के श्रीजगन्नाथ पुरी की परंपरा के अनुरूप सरायकेला, खरसावां और हरिभंजा में भी सोमवार रात यह अनुष्ठान श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाएगा।
रथ भंगिनी की निभाई जाएगी परंपरा
हेरा पंचमी के अवसर पर माता लक्ष्मी की कांस्य प्रतिमा को विशेष पालकी में विराजमान कर लक्ष्मी मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक शोभायात्रा निकाली जाएगी। विधि-विधान से पूजा के बाद माता लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ के नंदिघोष रथ के समीप पहुंचेंगी और प्रतीकात्मक रूप से रथ के अगले हिस्से की लकड़ी एवं पहिये को क्षतिग्रस्त करेंगी। इस परंपरा को रथ भंगिनी कहा जाता है। इसके बाद सेवायत और पुजारी देवी का मान-मनौव्वल कर उन्हें पुनः श्रीमंदिर ले जाएंगे।
पौराणिक कथा से जुड़ी है परंपरा
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं। कई दिन बीतने के बाद भी उनके वापस नहीं लौटने पर देवी महालक्ष्मी नाराज होकर स्वयं उन्हें लेने पहुंचती हैं। भगवान के आश्वासन के बावजूद वह प्रतीकात्मक रूप से उनके रथ का एक हिस्सा तोड़कर अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं और फिर श्रीमंदिर लौट जाती हैं।
बाहुड़ा रथयात्रा की शुरू होती है तैयारी
हेरा पंचमी के बाद भगवान जगन्नाथ की वापसी यानी बाहुड़ा रथयात्रा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। दक्षिणामुख संस्कार के बाद निर्धारित तिथि पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।




