नई दिल्ली | 3 अगस्त 2026
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और ओमान के बीच चल रही बातचीत अब अंतिम चरण में पहुंच गई है। यदि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित व्यवस्था पर सहमति बन जाती है तो भारत सहित कई एशियाई देशों के लिए कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की आपूर्ति पहले की तुलना में अधिक सुचारु हो सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है।
वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हाल के महीनों में ईरान-अमेरिका तनाव और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी। इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और ऊर्जा आपूर्ति पर भी देखने को मिला।
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े मुद्दों पर ओमान के साथ वार्ता में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है और बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। ईरानी सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, दोनों देशों के बीच ऐसा समाधान तैयार करने की कोशिश की जा रही है जिससे समुद्री यातायात सुरक्षित और व्यवस्थित ढंग से संचालित हो सके।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य जलडमरूमध्य को बंद या खोलने का फैसला करना नहीं है, बल्कि 'ट्रैफिक सेपरेशन स्कीम' के तहत जहाजों की आवाजाही के लिए एक बेहतर और सुरक्षित व्यवस्था विकसित करना है। इस प्रस्ताव में ईरान की सुरक्षा चिंताओं के साथ-साथ ओमान की भूमिका को भी महत्व दिया गया है।
इस बीच, ईरान ने अमेरिका की ओर से मिलने वाली किसी भी सैन्य चुनौती का जवाब देने की अपनी तैयारी दोहराई है। हालांकि, कूटनीतिक स्तर पर हो रही बातचीत को क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
भारत को कैसे होगा फायदा ?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आयात करता है। ऐसे में होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर भारत की तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ता है। यदि ईरान और ओमान के बीच सहमति बनती है और समुद्री मार्ग पहले की तरह सुरक्षित एवं सुचारु हो जाता है, तो भारतीय रिफाइनरियों तक कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति आसान हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिर समुद्री यातायात से माल ढुलाई की लागत में कमी आ सकती है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता भी घटेगी। इससे भारत जैसे बड़े आयातक देशों को राहत मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। हालांकि अभी तक किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है। दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और अंतिम निर्णय आने के बाद ही नई व्यवस्था लागू होने की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल, इस वार्ता को क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक तेल आपूर्ति के लिहाज से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।




