नई दिल्ली, 10 अगस्त 2026 : भारत और रूस के बीच रिश्तों में अब कनेक्टिविटी का एक नया अध्याय जुड़ सकता है। रूस ने भारत तक रेल संपर्क विकसित करने की संभावना पर चर्चा शुरू की है। अगर यह प्रस्ताव भविष्य में जमीन पर उतरता है तो भारत और रूस के बीच व्यापार के साथ मध्य एशिया और यूरोप तक ओवरलैंड कनेक्टिविटी को भी नई दिशा मिल सकती है। रूसी उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने रूसी समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू में भारत तक रेल मार्ग की संभावना का उल्लेख किया है। प्रस्तावित कनेक्टिविटी का मकसद समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करना और वैकल्पिक व्यापार मार्ग तैयार करना बताया जा रहा है। हालांकि अभी यह प्रारंभिक प्रस्ताव और चर्चा के स्तर पर है। फिलहाल किसी यात्री ट्रेन, टिकट, किराया, आधिकारिक रूट या सेवा शुरू होने की तारीख की घोषणा नहीं हुई है।
मॉस्को से भारत तक ट्रेन चली तो कितने घंटे लगेंगे ?
भारत और मॉस्को के बीच संभावित रेल रूट की वास्तविक लंबाई अभी तय नहीं है। मॉस्को से दिल्ली की हवाई दूरी करीब 4,300 किलोमीटर है मगर ट्रेन को अलग-अलग देशों से होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। प्रस्तावित रूट में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंचने की संभावना का जिक्र किया गया है। इस वजह से रेल दूरी 6,000 से 7,500 किलोमीटर या उससे अधिक हो सकती है। अगर उदाहरण के तौर पर दूरी 7,000 किलोमीटर मानें और ट्रेन की औसत गति 130-150 किलोमीटर प्रति घंटे रहे, तो केवल चलने के समय के हिसाब से सफर 47 से 54 घंटे का हो सकता है। हालांकि असल यात्रा इससे काफी लंबी होगी। सीमा जांच, कस्टम, सुरक्षा जांच, स्टॉपेज, ट्रैक की स्थिति, अलग-अलग देशों के रेल सिस्टम और संभावित गेज परिवर्तन के कारण यात्रा का कुल समय 3 से 5 दिन या उससे अधिक हो सकता है।
क्या राजधानी या शताब्दी जैसी रफ्तार से मॉस्को पहुंचना संभव होगा ?
भारत की राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों की औसत परिचालन गति अलग-अलग रूट पर अलग होती है। वहीं अंतरराष्ट्रीय रेल कॉरिडोर में सिर्फ ट्रेन की अधिकतम स्पीड मायने नहीं रखती। कई देशों की सीमाएं पार करने के दौरान ट्रेन को जांच और औपचारिकताओं से गुजरना होगा। इसके अलावा अलग-अलग देशों में ट्रैक, सिग्नलिंग और रेल गेज की व्यवस्था भी अलग हो सकती है। इसलिए 130-150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार को पूरे 7,000 किलोमीटर के सफर में लगातार बनाए रखना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता।
भारत-रूस रेल लिंक का असली मकसद क्या है ?
भारत और रूस के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क का मुख्य फोकस यात्री सेवा से ज्यादा माल ढुलाई और व्यापारिक कनेक्टिविटी हो सकता है। इससे समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने के साथ मध्य एशिया और रूस तक भारत की पहुंच मजबूत हो सकती है। रूस के लिए भी भारतीय महासागर और दक्षिण एशिया तक वैकल्पिक भूमि मार्ग महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
INSTC से जुड़ सकता है नया रेल कॉरिडोर
भारत, रूस और ईरान पहले से ही इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के जरिए मल्टी-मॉडल कनेक्टिविटी को बढ़ावा दे रहे हैं। INSTC का उद्देश्य भारत को ईरान, रूस और आगे यूरोप से जोड़ना है। इसमें रेल, सड़क और समुद्री मार्गों का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में भारत-रूस के बीच भविष्य का कोई नया रेल संपर्क मौजूदा कनेक्टिविटी नेटवर्क को मजबूत कर सकता है।
रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान और अफगानिस्तान
प्रस्तावित रूट को लेकर सबसे बड़ी चुनौतियों में भू-राजनीतिक स्थिति भी शामिल है। अगर रेल मार्ग तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक आता है, तो कई देशों के बीच सुरक्षा और राजनीतिक सहयोग जरूरी होगा। इसके अलावा सीमा पार कस्टम व्यवस्था, रेल गेज, ट्रैक इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और सुरक्षा जैसी चुनौतियों का समाधान करना होगा।
व्यापार के लिए क्यों गेमचेंजर हो सकता है रेल लिंक ?
अगर भारत और रूस के बीच प्रभावी भूमि संपर्क तैयार होता है तो माल ढुलाई के लिए वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध हो सकता है। इससे कुछ व्यापारिक मार्गों पर समुद्री परिवहन की निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए यह मध्य एशिया और रूस के साथ व्यापार बढ़ाने का नया माध्यम बन सकता है। वहीं रूस को दक्षिण एशिया और भारतीय महासागर क्षेत्र तक अपनी लॉजिस्टिक पहुंच मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
अभी ट्रेन नहीं, सिर्फ प्रस्ताव
फिलहाल भारत-रूस के बीच कोई सीधी यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने वाली नहीं है। न ही इस संभावित रूट की आधिकारिक लंबाई, निर्माण लागत, समय सीमा या लॉन्च डेट तय हुई है। इसलिए मॉस्को से भारत तक 3-5 दिन की यात्रा का अनुमान सिर्फ संभावित दूरी और गति के आधार पर लगाया जा सकता है। वास्तविक समय रूट, ट्रैक, सीमा प्रक्रियाओं और भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करेगा।अगर यह महत्वाकांक्षी योजना आगे बढ़ती है, तो भारत-रूस संबंधों के साथ-साथ पूरे मध्य और दक्षिण एशिया के व्यापारिक नक्शे पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।




