इंस्ताबुल, 23 अक्टूबर 2026 : दूसरे विश्वयुद्ध से पहले दुनिया कई खेमों में बंट गई थी। कई गुप्त गठबंधन बने और नतीजा ये हुआ कि पूरी दुनिया एक ऐसे युद्ध में उलझ गई, जिसमें लाखों लोग मारे गए। दूसरे विश्वयुद्ध के 80 साल बाद एक बार फिर दुनिया के अलग-अलग देश खेमे बनाने में जुटे हैं। अलग अलग सैन्य गठबंधन बनने लगे हैं। इस बीच तुर्की के इस्तांबुल में 23 अक्टूबर शुक्रवार को क्षेत्रीय और यूरोपीय देशों के विदेश मंत्रियों की एक बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र के साथ ब्रिटेन, फ्रांस व जर्मनी के प्रतिनिधि शामिल हुए। तुर्की के विदेश मंत्रालय के अनुसार सात देशों के इस संयुक्त प्रारूप में बैठक पहली बार हुई। इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर बातचीत करना था। पाकिस्तान की ओर से उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार ने हिस्सा लिया। इस बैठक की पहल तुर्की ने की थी। ऐसे में यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक संपर्क बढ़ाने का अवसर जरूर है।
क्या है R4 और E3 ?
R4 समूह में तुर्की, पाकिस्तान, सऊदी अरब और मिस्र शामिल हैं। वहीं E3 समूह ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी का मंच है। इस्तांबुल में दोनों समूहों के प्रतिनिधियों ने क्षेत्रीय संघर्षों और साझा सुरक्षा चुनौतियों पर चर्चा की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बातचीत के प्रमुख मुद्दों में मध्य पूर्व की स्थिति, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष, यमन में तनाव, होर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे अहम समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा रूस-यूक्रेन युद्ध शामिल थे।
बद्र मेमोरेंडम से रक्षा सहयोग को बढ़ावा
इस बैठक से पहले 21 अक्टूबर को कतर की राजधानी दोहा में तुर्की, पाकिस्तान, कतर व इंडोनेशिया ने Badr Memorandum of Understanding पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य रक्षा उद्योग में सहयोग, सैन्य उत्पादन, अनुसंधान एवं विकास और तकनीकी प्रशिक्षण को बढ़ावा देना है। हालांकि इस समझौते को किसी देश के खिलाफ सैन्य गठबंधन का प्रमाण नहीं माना जा सकता है। इसके प्रभाव का आकलन इसके क्रियान्वयन और भविष्य में होने वाले सहयोग के आधार पर ही किया जा सकेगा।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौता क्या है ?
तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने अगस्त 2026 में Mecca Joint Defense Agreement पर हस्ताक्षर किए थे। रिपोर्टों के मुताबिक इसमें किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में सामूहिक रक्षा सहयोग का प्रावधान है। तुर्की ने इस समझौते को किसी खास देश के खिलाफ नहीं बताया है।
क्या भारत के लिए चिंता की बात है ?
पाकिस्तान का तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना भारत के रणनीतिक विश्लेषकों के लिए निगरानी का विषय हो सकता है। संयुक्त रक्षा उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग से पाकिस्तान की क्षमताओं पर क्या असर पड़ेगा। यह समझौते के क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। मगर इस्तांबुल की R4-E3 बैठक को भारत के खिलाफ बनाई गई ढाल बताने के लिए अभी पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं हैं। जानकारी में बैठक का घोषित एजेंडा क्षेत्रीय सुरक्षा, कूटनीतिक समन्वय और संघर्षों से जुड़े मुद्दे हैं-भारत के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई नहीं है। इसलिए इस घटनाक्रम को पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता और क्षेत्रीय रक्षा सहयोग के संदर्भ में देखना अधिक तथ्यपरक होगा।




