नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 26 अगस्त 2026 : भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) एक बार फिर चर्चा में है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि को निलंबित कर दिया है और स्पष्ट किया है कि आतंकवाद और पानी का रिश्ता साथ-साथ नहीं चल सकता। दूसरी ओर, पाकिस्तान लगातार संधि को लेकर अपना पक्ष रख रहा है। मगर मौजूदा विवाद सिर्फ भारत-पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव तक ही सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना, अनियमित मानसून, बाढ़ और सूखे ने करीब 64 साल पुराने इस समझौते की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
64 साल पुरानी संधि में क्या बदला ?
सिंधु जल संधि 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इसका मूल ढांचा उस दौर के हाइड्रोलॉजिकल डेटा और परिस्थितियों पर आधारित था। मगर आज परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, बारिश का पैटर्न बदल रहा है और कई क्षेत्रों में कभी बाढ़ तो कभी सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है। ऐसे में केवल पानी के बंटवारे पर आधारित व्यवस्था को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं माना जा रहा। पर्यावरण कानून के विशेषज्ञ अनवर सदात के अनुसार, अब सिंधु जल संधि को केवल ‘पानी के बंटवारे’ के समझौते के रूप में देखने के बजाय ‘साझा जल प्रबंधन’ के नजरिए से अपडेट करने की जरूरत है।
भारत और पाकिस्तान की अलग-अलग जरूरतें
पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर काफी निर्भर है। उसे सिंचाई के साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण और भरोसेमंद जल आपूर्ति की जरूरत है। वहीं भारत के सामने जम्मू-कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं और स्थानीय जल जरूरतों को पूरा करने की चुनौती है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की व्यवस्था में दोनों देशों की जरूरतों के साथ-साथ बदलते पर्यावरणीय हालात को भी शामिल करना जरूरी होगा।
‘न्यायसंगत और उचित उपयोग’ का फॉर्मूला
साझा नदियों के लिए Equitable and Reasonable Utilisation (ERU) यानी न्यायसंगत और उचित उपयोग के सिद्धांत को ज्यादा महत्व देने की बात सामने आई है। इसका उद्देश्य केवल यह तय करना नहीं होगा कि नदी के पानी पर किसका कितना अधिकार है, बल्कि नदी से जुड़े सभी देशों की मौजूदा जरूरतों, पर्यावरण, आबादी, कृषि, ऊर्जा और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।
दुनिया के दूसरे समझौतों से क्या सीख सकता है सिंधु समझौता ?
विशेषज्ञों ने भारत-पाकिस्तान के लिए कुछ अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों के उदाहरण भी सामने रखे हैं।अमेरिका-कनाडा जल समझौता : साझा जल संसाधनों से मिलने वाले लाभों को दोनों देशों के बीच बांटने और बाढ़ नियंत्रण व बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों में सहयोग का मॉडल सामने रखता है। अमेरिका-मेक्सिको कोलोराडो नदी समझौता : पानी के बहाव और मौसम में बदलाव के अनुसार फैसलों में लचीलापन देने का उदाहरण है। नील नदी बेसिन व्यवस्था : जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों में बदलाव के अनुसार जल उपयोग के नियमों की समीक्षा की गुंजाइश दिखाती है।
जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ी चुनौती
सिंधु बेसिन के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब सिर्फ भारत-पाकिस्तान का विवाद नहीं, बल्कि Climate Change भी है। ग्लेशियरों के पिघलने से शुरुआती दौर में पानी का बहाव बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में जल उपलब्धता पर दबाव बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा अनियमित मानसून, अचानक बाढ़ और लंबे सूखे दोनों देशों के लिए जोखिम बढ़ा सकते हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों ही आर्द्रभूमि संरक्षण से जुड़े Ramsar Convention और जैव विविधता संरक्षण से जुड़े Convention on Biological Diversity जैसे अंतरराष्ट्रीय समझौतों का हिस्सा हैं। ऐसे में साझा जल संसाधनों के प्रबंधन में पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को भी शामिल करना महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या नया फॉर्मूला बन सकता है ?
मौजूदा परिस्थितियों में सिंधु जल संधि को पूरी तरह नए समझौते से बदलना आसान नहीं होगा। भारत-पाकिस्तान के बीच राजनीतिक और सुरक्षा तनाव इसके रास्ते में बड़ी बाधा है। हालांकि, एक संभावित रास्ता यह हो सकता है कि भविष्य की व्यवस्था में जल बंटवारे के साथ जल संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, जलविद्युत, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया जाए। यानी आने वाले समय में सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि ‘किसे कितना पानी मिलेगा?’, बल्कि यह भी होगा कि ‘बदलती जलवायु में सिंधु बेसिन का साझा और टिकाऊ प्रबंधन कैसे किया जाए?’ यही बदलाव 64 साल पुराने सिंधु जल समझौते के भविष्य की दिशा तय कर सकता है।




