नई दिल्ली, 26 अगस्त 2026 : दहेज से जुड़े मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाई कोर्ट को कई अहम निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने IPC की धारा 304-B (दहेज मृत्यु) और 498-A (दहेज प्रताड़ना) के साथ नए कानून BNS की संबंधित धाराओं के मामलों की सुनवाई में भी तेजी लाने और पुराने लंबित मामलों की नियमित निगरानी करने को कहा है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 20 अगस्त को 15 दिसंबर 2025 के फैसले के अनुपालन पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए।
तीन साल से पुराने मामलों की होगी खास निगरानी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 304-B, 498-A और BNS की धारा 80 व 85 के तहत आने वाले मामलों को, जहां संभव हो, प्राथमिकता के आधार पर तेजी से निपटाया जाए। जिला न्यायपालिका को तीन साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों की पहचान करने को कहा गया है। खास तौर पर वे केस जिनमें आरोप तय होने या गवाही दर्ज होने की प्रक्रिया लंबे समय से अटकी है, उनकी नियमित समीक्षा की जाएगी।
60 से 90 दिनों में आरोप तय करने का प्रयास
ट्रायल कोर्ट को आरोपपत्र दाखिल होने के बाद आरोपी की जल्द पेशी सुनिश्चित करने और सामान्य परिस्थितियों में 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने का प्रयास करने को कहा गया है। आरोप तय होने के बाद गवाही की प्रक्रिया जल्द शुरू करने और जहां संभव हो, लगातार या दिन-प्रतिदिन गवाही दर्ज करने के निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, कई आरोपी, पूरक आरोपपत्र, फोरेंसिक जांच में देरी या आरोपी की गैरहाजिरी जैसी असाधारण परिस्थितियों में इन समय-सीमाओं में बदलाव संभव होगा।
बार-बार तारीख देने पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को अनावश्यक स्थगन से बचने का निर्देश दिया है। यदि किसी मामले में स्थगन दिया जाता है तो उसका कारण लिखित रूप में दर्ज करना होगा। आरोपी पक्ष के वकील के बार-बार अनुपस्थित रहने की स्थिति में अदालत उचित कानूनी सहायता वकील या एमिकस क्यूरी की मदद ले सकती है। इसके अलावा आरोप तय होते ही महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही, समन की तामील और साक्ष्य की प्रक्रिया के लिए Witness Calendar तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
डिजिटल Dashboard से होगी निगरानी
हाई कोर्ट को 304-B और 498-A मामलों की Stage-Wise Pendency की निगरानी के लिए कोर्ट डैशबोर्ड और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने का प्रयास करने को कहा गया है। पुराने मामलों के लिए ऑटोमेटेड अलर्ट सिस्टम बनाने की भी बात कही गई है। हाई कोर्ट लंबे समय से लंबित आपराधिक अपील, रिवीजन और जमानत मामलों की भी समय-समय पर समीक्षा करेंगे।
दहेज निषेध अधिकारियों की भूमिका होगी मजबूत
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को Dowry Prohibition Officers की प्रभावी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने को कहा है। इसके साथ ही वन स्टॉप सेंटर, फैमिली काउंसलिंग सेंटर, महिला हेल्प डेस्क, हेल्पलाइन और पीड़ित सहायता तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि महिलाओं को कानूनी मदद और शिकायत निवारण की सुविधा आसानी से मिल सके।
पुलिस, जज और अभियोजकों की होगी ट्रेनिंग
राज्यों और हाई कोर्ट को न्यायिक अधिकारियों, पुलिस, अभियोजकों, प्रोटेक्शन ऑफिसर्स और काउंसलर्स के लिए नियमित Training और Sensitisation Programmes आयोजित करने को कहा गया है। महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों का अनुभव रखने वाले संवेदनशील अभियोजकों को 304-B और 498-A मामलों की पैरवी के लिए नामित करने का भी प्रयास किया जाएगा।
हर साल तीन बार देनी होगी Compliance Report
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और हाई कोर्ट को हर साल 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में लंबित और निपटाए गए मामलों की संख्या, मामलों की स्टेज-वाइज स्थिति, जागरूकता अभियान, डाउरी प्रोहिबिशन ऑफिसर्स, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अदालत के निर्देशों के अनुपालन की जानकारी देनी होगी। इस मामले को 15 अक्टूबर 2026 को फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
आखिर क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट का आदेश ?
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश दहेज मृत्यु और दहेज प्रताड़ना के मामलों में Justice Delay कम करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया है कि सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पुलिस जांच से लेकर ट्रायल और अपील तक पूरी प्रक्रिया की लगातार निगरानी जरूरी है।




