नई दिल्ली/वॉशिंगटन, 25 अगस्त 2026 : अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर एकबार फिर से दबाव बढ़ा दिया है। इस तरह अमेरिका ने ईरान के कारोबार से जुड़े पांच प्रमुख क्षेत्रों पर नए प्रतिबंध लगा दिए हैं। इनमें डिजिटल एसेट्स, टेक्नोलॉजी, सोना, एविएशन और शिपिंग सेक्टर शामिल हैं। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इन क्षेत्रों के जरिए ईरान को होने वाली आर्थिक कमाई और अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर रोक लगाना इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। अमेरिका ने यह भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ प्रतिबंधित क्षेत्रों में कारोबार करने वाले दूसरे देशों या विदेशी कंपनियों के खिलाफ भी Secondary Sanctions लगाए जा सकते हैं।
ईरान की कमाई के पांच रास्तों पर अमेरिकी शिकंजा
अमेरिका की नई कार्रवाई में ईरान से जुड़े पांच महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है।
- Digital Assets: क्रिप्टोकरेंसी और अन्य डिजिटल वित्तीय गतिविधियां।
- Technology: ईरान से जुड़े टेक्नोलॉजी कारोबार और सप्लाई नेटवर्क।
- Gold: सोने से जुड़े लेन-देन और आर्थिक गतिविधियां।
- Aviation: विमानन क्षेत्र से जुड़े कारोबार और सेवाएं।
- Shipping: जहाजरानी, समुद्री परिवहन और उससे जुड़े कारोबार।
अमेरिका का मानना है कि इन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ाकर ईरान की विदेशी मुद्रा कमाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच को सीमित किया जा सकता है।
ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर भी कार्रवाई ?
नई अमेरिकी नीति का सबसे अहम पहलू Secondary Sanctions का खतरा है। इसका मतलब है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाले ईरानी कारोबार के साथ लेन-देन करने वाली विदेशी कंपनियों या संस्थाओं पर भी कार्रवाई की जा सकती है। ऐसी स्थिति में संबंधित कंपनियों को अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था, बैंकों और बाजार तक पहुंच खोने का जोखिम हो सकता है। ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में चीन, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) शामिल हैं। ऐसे में इन देशों की कंपनियों पर भी अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव का असर पड़ सकता है।
अमेरिका ने इसे बताया ‘Operation Economic Outcast’
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका ने ‘Operation Economic Outcast’ शुरू किया है। इसे ईरान और उसके सहयोगियों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के अभियान के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिकी पक्ष के अनुसार ईरान के सामने दो विकल्प हैं—एक तरफ वैश्विक अर्थव्यवस्था से और अधिक अलग-थलग होना और दूसरी तरफ सामान्य आर्थिक संबंधों की दिशा में लौटने का रास्ता तलाशना।
Secondary Sanctions क्या हैं ?
Secondary Sanctions ऐसे प्रतिबंध हैं जिनका असर सीधे उस देश के अलावा तीसरे देशों की कंपनियों या संस्थाओं पर भी पड़ सकता है, जो प्रतिबंधित कारोबार में शामिल होती हैं। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी विदेशी कंपनी का ईरान के साथ ऐसा कारोबार है जिसे अमेरिका ने प्रतिबंधित किया है, तो उस कंपनी को अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था में कारोबार करने में परेशानी हो सकती है।अमेरिकी डॉलर की वैश्विक भूमिका और अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम तक पहुंच के कारण ऐसे प्रतिबंध कंपनियों के लिए बड़ा आर्थिक जोखिम पैदा कर सकते हैं।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है ?
अमेरिकी प्रतिबंधों का मतलब यह नहीं है कि भारत पर सीधे प्रतिबंध लग गए हैं। हालांकि ईरान से जुड़े कारोबार में अमेरिकी नियमों के कारण भारतीय कंपनियों के सामने चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
1. तेल कारोबार
ईरान से कच्चे तेल की खरीद या उससे जुड़े भुगतान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर पड़ सकता है। इससे भारत के लिए ईरान के साथ ऊर्जा कारोबार करना अधिक जटिल हो सकता है।
2. चाबहार पोर्ट
ईरान का Chabahar Port भारत के लिए रणनीतिक और व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रतिबंधों के विस्तार की स्थिति में इससे जुड़ी गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
3. डॉलर में भुगतान
ईरान से जुड़े भारतीय कारोबार में अमेरिकी वित्तीय नियम लागू होने की स्थिति में डॉलर में भुगतान और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग लेन-देन मुश्किल हो सकते हैं।
4. भारतीय कंपनियों पर दबाव
ईरान के साथ कारोबार करने वाली भारतीय कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों और Compliance Rules का ध्यान रखना होगा। प्रतिबंधित कारोबार में शामिल होने पर अमेरिकी कार्रवाई का जोखिम बढ़ सकता है।
5. कूटनीतिक दबाव
अमेरिका भारत पर ईरान के साथ आर्थिक संबंध सीमित करने के लिए दबाव बना सकता है। हालांकि, भारत अपने राष्ट्रीय हित, ऊर्जा जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर फैसला ले सकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर होगी कि किन विदेशी कंपनियों या देशों पर Secondary Sanctions लागू किए जाते हैं। अगर प्रतिबंधों का दायरा बढ़ता है तो इसका असर ईरान के साथ कारोबार करने वाली वैश्विक कंपनियों, ऊर्जा बाजार व अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर पड़ सकता है। भारत के लिए तेल, चाबहार पोर्ट व ईरान के साथ व्यापारिक संबंध सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे।




