नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026 : रूस अपने व्यापार और रणनीतिक हितों के लिए नए और सुरक्षित समुद्री रास्तों पर तेजी से काम कर रहा है। इसी कड़ी में Northern Sea Route (NSR) को लेकर रूस भारत और चीन दोनों के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि भारत उन देशों में शामिल है, जो इस आर्कटिक समुद्री मार्ग को लेकर रूस के साथ बातचीत कर रहे हैं। रूस पहले से चीन के साथ NSR पर सहयोग कर रहा है। ऐसे में भारत की संभावित भागीदारी इस परियोजना को और अहम बना सकती है। खास बात यह है कि रूस ऐसे समय में भारत को इस रणनीतिक परियोजना से जोड़ना चाहता है, जब आर्कटिक क्षेत्र में चीन की आर्थिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं।

क्या है Northern Sea Route ?

Northern Sea Route रूस के आर्कटिक तट के साथ गुजरने वाला समुद्री मार्ग है। यह आर्कटिक महासागर के जरिए अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ता है। मौजूदा समय में यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार के लिए स्वेज नहर प्रमुख रास्ता है। NSR इसका एक वैकल्पिक मार्ग बन सकता है। अनुकूल परिस्थितियों में इस रूट से कुछ यात्राओं में करीब 10 से 14 दिन तक का समय बचने की संभावना जताई जाती है।

रूस के लिए क्यों बेहद अहम है NSR ?

रूस के लिए Northern Sea Route केवल व्यापारिक रास्ता नहीं है। यह उसकी ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और रणनीतिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आर्कटिक क्षेत्र में रूस के पास तेल, गैस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं। बेहतर समुद्री कनेक्टिविटी से इन संसाधनों को एशियाई और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाना आसान हो सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बीच रूस ने एशिया के साथ अपने आर्थिक संबंधों पर ज्यादा जोर दिया है। ऐसे में चीन और भारत जैसे बड़े बाजार रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण ?

भारत रूस से ऊर्जा का बड़ा खरीदार है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से व्यापारिक संबंध हैं। ऐसे में NSR के जरिए भारत की भागीदारी रूस के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से फायदेमंद हो सकती है। रूस के सुदूर पूर्व और आर्कटिक क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। ऐसे में भारत को इस क्षेत्र के विकास से जोड़ना रूस के लिए चीन पर अत्यधिक निर्भरता को संतुलित करने का एक विकल्प भी माना जा सकता है।

क्या NSR स्वेज नहर का विकल्प बन सकता है ?

NSR की दूरी और संभावित समय बचत इसे आकर्षक बनाती है, लेकिन फिलहाल इसे स्वेज नहर का सीधा विकल्प मानना जल्दबाजी होगी। आर्कटिक क्षेत्र में बेहद कठिन मौसम, समुद्री बर्फ और सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर बड़ी चुनौतियां हैं। इस रूट पर सामान्य जहाजों के बजाय कई जगह आइस-क्लास जहाजों और विशेष तकनीकी सुविधाओं की जरूरत पड़ती है। बंदरगाह, संचार व्यवस्था, सुरक्षा और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं भी NSR के विस्तार में चुनौती बनी हुई हैं।

भारत-चीन को साथ लाने की कोशिश क्यों ?

रूस के लिए भारत और चीन दोनों महत्वपूर्ण साझेदार हैं। चीन NSR पर रूस के साथ पहले से काम कर रहा है, जबकि भारत की संभावित भागीदारी इस रूट को व्यापक एशियाई व्यापार नेटवर्क से जोड़ सकती है। यही वजह है कि NSR को आने वाले वर्षों में सिर्फ एक समुद्री व्यापार मार्ग नहीं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीति को जोड़ने वाले रणनीतिक कॉरिडोर के रूप में देखा जा रहा है।