वाराणसी, 15 अगस्त। स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल आंदोलनों, सत्याग्रह और क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा। काशी यानी वाराणसी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में विचार, साहित्य, पत्रकारिता और शिक्षा के माध्यम से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शहर के साहित्यकारों, पत्रकारों, शिक्षाविदों और क्रांतिकारियों ने अपनी लेखनी और गतिविधियों से लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाई।

क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों का प्रमुख केंद्र बनी काशी

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान काशी क्रांतिकारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रही। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, डॉ. संपूर्णानंद और बाबूराव विष्णु पराड़कर जैसे नामों ने साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय विचारों को मजबूत किया। नमक आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी शहर में स्वतंत्रता की भावना तेज हुई।

‘रणभेरी’ जैसे प्रकाशनों ने पहुंचाई क्रांति की आवाज

ब्रिटिश शासन के दौरान राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों और पर्चों पर लगातार नजर रखी जाती थी। काशी से जुड़े ‘रणभेरी’ जैसे प्रकाशनों ने लोगों तक स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित विचार और संदेश पहुंचाने में भूमिका निभाई। प्रतिबंधों के बावजूद भूमिगत तरीके से साहित्य और पर्चों का प्रसार किया जाता था।

घरों में छपते थे गुप्त पर्चे

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत गतिविधियां और तेज हुईं। कई स्थानों पर गुप्त बैठकों और साहित्य के प्रसार की गतिविधियां चलती थीं। ब्रिटिश प्रशासन की कार्रवाई के बावजूद आंदोलन से जुड़े लोग अपने ठिकाने बदलकर गतिविधियां जारी रखते थे।

शिक्षा संस्थानों ने भी जगाई राष्ट्रीय चेतना

काशी हिंदू विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ ने युवाओं में राष्ट्रवाद और स्वदेशी विचारों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महात्मा गांधी के काशी दौरे और उनके विचारों ने भी राष्ट्रीय चेतना को व्यापक बनाया।

प्रेमचंद की लेखनी से लेकर 1857 तक की विरासत

मुंशी प्रेमचंद की शुरुआती रचना ‘सोजे वतन’ को ब्रिटिश सरकार की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। वहीं काशी का प्रतिरोध इतिहास 1857 से भी पहले का है। 1781 में राजा चेत सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष हुआ था। बाद में चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों का संबंध भी काशी से जुड़ा।

इस तरह काशी ने कलम, शिक्षा, पत्रकारिता, संस्कृति और प्रत्यक्ष संघर्ष—हर माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक ताकत दी।