नई दिल्ली, 26 अगस्त 2026 : पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की प्रस्तावित व्यवस्था यानी ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने संसद की संयुक्त समिति के सामने इसे ‘असंवैधानिक’ और बिना पर्याप्त विचार के तैयार किया गया प्रस्ताव बताया। चिदंबरम ने संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर समिति के सामने अपनी आपत्तियां रखीं। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कहा कि उनका जमीर इन विधेयकों का समर्थन करने की अनुमति नहीं देता।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर चिदंबरम ने क्या कहा?

चिदंबरम के मुताबिक, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच साल का होता है। ऐसे में किसी सदन का कार्यकाल निर्धारित अवधि से पहले खत्म करना या उसकी अवधि में बदलाव करना संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव को लेकर कई संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल भी समिति के सामने रखे।

TMC सांसद सागरिका घोष ने भी किया विरोध

तृणमूल कांग्रेस की समिति सदस्य सागरिका घोष ने भी दोनों विधेयकों का विरोध किया। उन्होंने आशंका जताई कि प्रस्तावित व्यवस्था से चुनाव आयोग को अत्यधिक अधिकार मिल सकते हैं। वहीं, समिति के सामने अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े करीब 10 पद्म पुरस्कार प्राप्त लोग पेश हुए। इनमें कुछ लोगों ने One Nation One Election का समर्थन किया, जबकि कुछ ने इसके विरोध में अपनी राय रखी।

दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुए थे विधेयक

संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 को दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था। इसके बाद दोनों विधेयकों को विस्तृत विचार-विमर्श के लिए संसद की संयुक्त समिति के पास भेज दिया गया। इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था। इस समिति ने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनावों को चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी इस समिति के सदस्य थे।

1951 से 1967 तक साथ हुए थे चुनाव

भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव पहले भी एक साथ कराए जाते रहे हैं। देश में पहली बार 1951-52 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हुए थे। इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराए गए। हालांकि, कुछ राज्यों की विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और बाद में लोकसभा के कार्यकाल में हुए बदलाव के कारण यह चुनावी चक्र टूट गया। 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभाएं समय से पहले भंग हुईं। इसके बाद 1970 में चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग कर दी गई और 1971 में आम चुनाव हुए। इसके बाद देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे।

‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर क्यों है विवाद ?

एक साथ चुनाव कराने के समर्थकों का तर्क है कि इससे बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाला खर्च कम हो सकता है और सरकारों को लगातार चुनावी तैयारियों के बजाय विकास कार्यों पर ध्यान देने का अधिक समय मिलेगा। विरोध करने वाले दलों का कहना है कि अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। ऐसे में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने से संघीय ढांचे, क्षेत्रीय मुद्दों और मतदाताओं की स्वतंत्र पसंद पर असर पड़ सकता है। फिलहाल संयुक्त संसदीय समिति में इस प्रस्ताव को लेकर अलग-अलग पक्षों की राय सामने आ रही है। चिदंबरम का ताजा विरोध इस मुद्दे पर राजनीतिक और संवैधानिक बहस को और तेज कर सकता है।