चाईबासा | 12 अगस्त 2026

पश्चिमी सिंहभूम जिले के तांतनगर प्रखंड के कासिया पंचायत अंतर्गत सेरेंगबिल गांव की रहने वाली मंजू बिरूली ने नशे के खिलाफ अपने संघर्ष से सामाजिक बदलाव की मिसाल पेश की है। पति के नियमित नशापान से परेशान होकर शुरू किया गया उनका अभियान धीरे-धीरे पूरे गांव तक पहुंचा। करीब 2 हजार की आबादी वाले इस गांव में अब नशे के खिलाफ जागरूकता को लेकर मंजू का प्रयास चर्चा का विषय बना हुआ है।

पति की नशे की आदत बनी बदलाव की वजह

मंजू के पति के नशापान के कारण घर में अक्सर विवाद और तनाव की स्थिति रहती थी। इस परेशानी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि नशे की समस्या केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं है। इसके बाद उन्होंने हड़िया और दारू के सेवन तथा कारोबार के खिलाफ शांतिपूर्ण अभियान शुरू किया।

जहां बनता था हड़िया-दारू, वहीं बैठकर करती थीं विरोध

मंजू ने विरोध के लिए टकराव का रास्ता नहीं चुना। गांव में जिस घर में हड़िया या दारू बनाए जाने की जानकारी मिलती, वह वहां पहुंच जाती थीं और सुबह से रात तक शांतिपूर्वक बैठकर लोगों को समझाती थीं। वह नशे से परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक प्रभावों के बारे में लोगों को जागरूक करती थीं।

ग्रामसभा में भी उठाया नशामुक्ति का मुद्दा

एक ग्रामसभा के दौरान गांव के विकास, मनरेगा, बागवानी, स्वच्छता और अन्य मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान मंजू ने सवाल उठाया कि जब गांव की इतनी समस्याओं पर चर्चा हो रही है तो नशापान रोकने पर बात क्यों नहीं हो रही।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक ग्रामसभा में नशामुक्ति पर चर्चा नहीं होगी, वह नहीं बैठेंगी। ग्रामीणों के समझाने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहीं। इसके बाद ग्रामसभा में नशापान की रोकथाम को लेकर चर्चा की गई।

धीरे-धीरे बदला लोगों का नजरिया

लगातार जागरूकता और शांतिपूर्ण सत्याग्रह का असर गांव में दिखाई देने लगा। लोगों ने नशे से होने वाले नुकसान पर विचार करना शुरू किया और हड़िया-दारू से दूरी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। ग्रामीण मुंडा गौरी शंकर बिरुली के अनुसार, मंजू की पहल ने गांव में नशे के मुद्दे को गंभीर चर्चा का विषय बनाया।

एक महिला के प्रयास से मिला बड़ा संदेश

मंजू बिरूली की कहानी बताती है कि सामाजिक बदलाव के लिए हमेशा टकराव जरूरी नहीं होता। धैर्य, दृढ़ इच्छाशक्ति और लगातार संवाद के जरिए भी समाज में बदलाव लाया जा सकता है। उनका यह अभियान 'स्वतंत्रता के सारथी—नशे के विरुद्ध युद्ध' जैसे सामाजिक संदेश को मजबूती देता है और ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी की अहमियत भी सामने लाता है।