मुंबई, 25 अगस्त 2026 : मुंबई में ऑटो-रिक्शा ड्राइवरों का एक वर्ग मराठी भाषा से जुड़े नए नियम के विरोध में उतर आया है। गैर-मराठी भाषी ड्राइवरों ने राज्य सरकार के खिलाफ तीन दिन की हड़ताल का ऐलान कर दिया है। ड्राइवरों का कहना है कि उम्रदराज लोगों के लिए अचानक भाषा सीखना बहुत मुश्किल है और सरकार को जुर्माने की जगह पर्याप्त समय और प्रशिक्षण देना चाहिए। विवाद ऐसे समय बढ़ा है, जब महाराष्ट्र परिवहन विभाग ने मराठी का बुनियादी ज्ञान नहीं रखने वाले ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों की जांच शुरू की है।

‘55-60 साल की उम्र में परिवार पालें या भाषा सीखें ?’

प्रदर्शन कर रहे कुछ ड्राइवरों का कहना है कि उन्होंने बहुत कम पढ़ाई की है और उनकी प्राथमिकता परिवार का खर्च चलाना है। उनका सवाल है कि 55-60 साल की उम्र में नई भाषा सीखना तथा रोजी -रोटी चलाना दोनों एक साथ कैसे संभव होगा ? ड्राइवरों का यह भी आरोप है कि कुछ मामलों में उन्हें सीखने का पर्याप्त मौका दिए बिना जुर्माने की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उनकी मांग है कि सरकार पहले स्पष्ट नियम बनाए, प्रशिक्षण की व्यवस्था करे और ड्राइवरों को पर्याप्त समय दे।

सरकार ने तीन महीने का समय देने की बात कही

महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने 19 अगस्त को कहा था कि नियमों का पालन नहीं करने वाले ड्राइवरों को पहले नोटिस दिया जाएगा और तीन महीने के भीतर मराठी सीखने का मौका मिलेगा। राज्य सरकार के मुताबिक तय अवधि में जरूरी भाषा ज्ञान हासिल नहीं करने पर लाइसेंस और बैज के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। 20 अगस्त से मराठी भाषा के ज्ञान को लेकर ऑटो और टैक्सी ड्राइवरों की जांच शुरू की गई है।

अब तक करीब 2500 नोटिस, 13 हजार ड्राइवरों की जांच

परिवहन विभाग के अनुसार, अभियान के तहत अब तक करीब 2,500 नोटिस जारी किए जा चुके हैं। 20 अगस्त से मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में लगभग 13 हजार ड्राइवरों की जांच की गई है। विभाग के मुताबिक, बातचीत की परीक्षा में जरूरी स्तर हासिल नहीं करने वाले ड्राइवरों को मराठी सीखने के लिए नोटिस दिया जा रहा है। हालांकि, ड्राइवर संगठनों का आरोप है कि नियमों को लागू करने की प्रक्रिया को लेकर अभी भी कई सवाल स्पष्ट नहीं हैं।

ड्राइवरों की मांग- जुर्माना नहीं, सीखने का मौका मिले

प्रदर्शन कर रहे ड्राइवरों का कहना है कि वे मराठी सीखने के खिलाफ नहीं हैं। कई ड्राइवर कामचलाऊ मराठी बोलने की कोशिश भी कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और समय मिलना चाहिए। एक ड्राइवर ने दावा किया कि मराठी सीखने के लिए कुछ ही सेशन कराए गए, जो पर्याप्त नहीं हैं। ड्राइवरों का कहना है कि उन पर पहले से ही EMI और परिवार के खर्च का दबाव है, ऐसे में भारी जुर्माना उनके लिए बड़ी समस्या बन सकता है।

‘वर्किंग नॉलेज’ कितनी मराठी ? नियम पर सवाल

सेवा सारथी ऑटो-रिक्शा टैक्सी एंड ट्रांसपोर्ट यूनियन के नेता डीएम गोसावी ने नियम की स्पष्टता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सरकार ने मराठी का ‘वर्किंग नॉलेज’ जरूरी बताया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसके लिए कितनी भाषा जानना अनिवार्य होगा। यूनियन ने आशंका जताई है कि नियम स्पष्ट नहीं होने पर RTO स्तर पर भ्रष्टाचार और ड्राइवरों के शोषण की गुंजाइश बढ़ सकती है।

करीब छह लाख ड्राइवरों को मराठी सिखाने की योजना

सरकार के अनुसार, महाराष्ट्र में करीब 9.16 लाख ऑटो-रिक्शा और 61,657 टैक्सियां हैं। सरकार लगभग छह लाख ऑटो-टैक्सी ड्राइवरों को मराठी सीखने की पहल से जोड़ना चाहती है। परिवहन मंत्री के अनुसार, इस अभियान में अब तक 1,65,601 ड्राइवर शामिल हो चुके हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि ड्राइवरों के लिए मराठी भाषा का नियम केवल बुनियादी बातचीत तक सीमित है। इसका उद्देश्य हिंदी या दूसरी भाषाएं बोलने वाले ड्राइवरों को मराठी का विशेषज्ञ बनाना नहीं है। सीएम फडणवीस ने यह भी कहा कि महायुति सरकार भाषा के आधार पर किसी के साथ अन्याय नहीं होने देगी। जरूरत पड़ने पर ड्राइवरों को कामचलाऊ मराठी सीखने के लिए अतिरिक्त समय दिया जा सकता है।

मंत्री प्रताप सरनाईक का ऑटो चलाने से मंत्री बनने तक का सफर

मराठी भाषा नियम को लेकर चर्चा में आए परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा है। राजनीति में आने से पहले सरनाईक ठाणे में ऑटो-रिक्शा चलाते थे। शुरुआती दौर में उन्होंने अगरबत्ती व कैलेंडर बेचने का काम किया। बाद में उन्होंने रियल एस्टेट और हॉस्पिटैलिटी कारोबार में कदम रखा। वह विहंग ग्रुप से जुड़े और 2024 के चुनावी हलफनामे में खुद को बिल्डर व होटल कारोबार से जुड़ा बताया। वर्तमान में वह शिंदे गुट की शिवसेना के विधायक और मंत्री हैं।

मुंबई में भाषा विवाद का असर

ऑटो ड्राइवरों की हड़ताल से मुंबई के कई इलाकों में यातायात और यात्रियों की आवाजाही प्रभावित होने की खबर है। फिलहाल विवाद का केंद्र यह है कि भाषा सीखने की अनिवार्यता को किस तरह लागू किया जाए और ड्राइवरों को नियम पूरा करने के लिए कितना समय दिया जाए। सरकार इसे बुनियादी संवाद की जरूरत बता रही है, जबकि ड्राइवर संगठन नियमों की स्पष्टता, प्रशिक्षण और पर्याप्त समय की मांग कर रहे हैं।