नई दिल्ली | 22 जुलाई 2026
हरिशयनी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है, सनातन परंपरा में विशेष धार्मिक महत्व रखती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और देवोत्थान एकादशी पर पुनः जागृत होते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसे साधना, संयम और आत्मशुद्धि का पवित्र काल माना जाता है।
योगनिद्रा का आध्यात्मिक संदेश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु की योगनिद्रा सामान्य विश्राम नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना, धैर्य और संतुलन का प्रतीक है। यह संदेश देती है कि जीवन में निरंतर भागदौड़ के साथ मानसिक शांति और आत्मचिंतन भी उतना ही आवश्यक है।
चातुर्मास में आत्मविकास का अवसर
चातुर्मास के दौरान व्यक्ति को अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली का मूल्यांकन करने की प्रेरणा दी जाती है। इस अवधि में सात्विक भोजन, संयमित दिनचर्या, पूजा-पाठ, ध्यान और स्वाध्याय को विशेष महत्व दिया गया है। माना जाता है कि यह समय मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए सबसे उपयुक्त होता है।
आज भी प्रासंगिक है यह परंपरा
आधुनिक जीवन में बढ़ते तनाव, व्यस्तता और मानसिक असंतुलन के बीच हरिशयनी एकादशी का संदेश पहले से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व बताता है कि वास्तविक प्रगति केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन, सकारात्मक सोच और नैतिक मूल्यों से भी होती है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक विश्वासों पर आधारित है। विभिन्न परंपराओं और ग्रंथों में वर्णित जानकारी को सामान्य सूचना के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।




