पटना | 28 जुलाई 2026: विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर मंगलवार को पटना के एक्जीबिशन रोड स्थित डॉ. दिवाकर तेजस्वी क्लिनिक में लीवर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन पब्लिक अवेयरनेस फॉर हेल्दी अप्रोच फॉर लिविंग (पहल) के तत्वावधान में किया गया, जिसमें लीवर स्वास्थ्य, हेपेटाइटिस की रोकथाम और सोशल मीडिया पर फैल रहे भ्रामक स्वास्थ्य दावों को लेकर लोगों को जागरूक किया गया।
सोशल मीडिया के भ्रामक प्रचार से बचने की सलाह
कार्यक्रम में 'पहल' के चिकित्सा निदेशक व वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. दिवाकर तेजस्वी ने कहा कि आजकल सोशल मीडिया पर बिना वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता परीक्षण और मानकीकरण वाले तथाकथित हर्बल, डिटॉक्स और इम्यूनिटी बूस्टर उत्पादों का बड़े पैमाने पर प्रचार किया जा रहा है।
उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे उत्पादों का बिना चिकित्सकीय सलाह के सेवन करने से लीवर के साथ-साथ किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को भी गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
कोविड के बाद बढ़े हर्ब-इंड्यूस्ड लीवर इंजरी के मामले
डॉ. तेजस्वी ने बताया कि कोविड-19 महामारी के बाद प्रकाशित कई अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आया है कि बिना डॉक्टर की सलाह के विभिन्न हर्बल तैयारियों और पत्तियों के रस का अत्यधिक सेवन करने वाले लोगों में हर्ब-इंड्यूस्ड लीवर इंजरी (Herb Induced Liver Injury) के मामले बढ़े हैं।
उन्होंने कहा कि कई मरीजों में लीवर में गंभीर सूजन, फाइब्रोसिस और यहां तक कि लीवर फेल होने जैसी स्थितियां भी देखी गई हैं।
हेपेटाइटिस-बी और सी अब भी बड़ी चुनौती
डॉ. तेजस्वी ने कहा कि हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी आज भी लीवर सिरोसिस और लीवर कैंसर के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। हालांकि, समय पर जांच, हेपेटाइटिस-बी का टीकाकरण, सुरक्षित जीवनशैली और वैज्ञानिक चिकित्सा के जरिए इन बीमारियों की रोकथाम और प्रभावी उपचार संभव है।
लोगों से की यह अपील
उन्होंने लोगों से अपील की कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी भी स्वास्थ्य संबंधी दावे पर आंख मूंदकर भरोसा न करें और किसी भी दवा, सप्लीमेंट या हर्बल उत्पाद का सेवन केवल योग्य चिकित्सक की सलाह पर ही करें।
उन्होंने लीवर को स्वस्थ रखने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, शराब से परहेज और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराने की भी सलाह दी।
विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों में लीवर रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित करना था।




