नई दिल्ली/इस्लामाबाद, 17 अक्टूबर 2026 : सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद लगातार जारी है। इस बीच हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) ने संधि की निरंतर वैधता और भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों पर फैसला दिया था। हालांकि भारत ने इस न्यायालय की कार्यवाही और उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है तथा फैसले को मानने से इनकार कर दिया है। भारत ने अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित रखने की घोषणा की थी। भारत का कहना है कि पाकिस्तान को सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर ठोस कदम उठाने होंगे। दूसरी ओर, पाकिस्तान संधि को लागू रखने और भारत के कदमों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।

क्या था हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय का फैसला ?

रिपोर्ट के मुताबिक 31 अगस्त को दिए गए फैसले में न्यायालय ने कहा कि सिंधु जल संधि तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक दोनों देशों के बीच उसे समाप्त करने या बदलने के लिए विधिवत समझौता नहीं होता। न्यायालय ने संधि के तहत एकतरफा निलंबन के प्रावधान पर भी सवाल उठाया। न्यायालय ने चिनाब नदी पर बन रही 850 मेगावाट की रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े कुछ पहलुओं पर भी निर्देश दिए हैं। भारत ने इस कार्यवाही को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए फैसले को खारिज किया है। इसलिए इस विवाद को केवल पाकिस्तान की जीत या भारत की हार के तौर पर देखना पूरे मामले की जटिलता को नजरअंदाज करना होगा।

पाकिस्तान के पास क्या विकल्प हैं ?

1. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मामला उठाना

पाकिस्तान मध्यस्थता न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर विश्व बैंक और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर संधि के पालन के लिए दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, ऐसे प्रयासों से भारत का रुख अपने आप बदल जाएगा, इसकी गारंटी नहीं है।

2. तकनीकी समीक्षा की मांग

पाकिस्तान चिनाब और झेलम नदियों पर भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं की डिजाइन और संचालन से जुड़े मुद्दों को तकनीकी प्रक्रिया के माध्यम से उठाने की कोशिश कर सकता है। इसके लिए संबंधित संधि प्रावधानों और लागू प्रक्रिया की भूमिका अहम होगी।

3. द्विपक्षीय बातचीत का रास्ता

दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने का विकल्प भी मौजूद है। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों में आतंकवाद का मुद्दा और संधि की स्थिति बातचीत को जटिल बनाते हैं।

भारत आगे क्या कर सकता है ?

कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को चुनौती : भारत का रुख रहा है कि वह मध्यस्थता कोर्ट की इस कार्यवाही को मान्यता नहीं देता है। वह इसी आधार पर फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर सकता है।

संधि में बदलाव की मांग : भारत लंबे समय से संधि के प्रावधानों में बदलाव की जरूरत की बात करता रहा है। जलवायु परिवर्तन, बदलती जल आवश्यकताओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद आगे भी बने रह सकते हैं।

जलविद्युत परियोजनाओं पर काम : भारत रतले और किशनगंगा जैसी परियोजनाओं को लेकर अपना पक्ष जारी रख सकता है। हालांकि, निर्माण और संचालन से जुड़े किसी भी कदम की कानूनी तथा तकनीकी स्थिति का आकलन संबंधित परियोजना और लागू नियमों के आधार पर करना होगा।

पाकिस्तान में पानी की कमी का मुद्दा

रिपोर्ट में पाकिस्तान की एक समिति के हवाले से खरीफ सीजन में पानी की उपलब्धता में 22 प्रतिशत कमी का अनुमान बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने जल प्रबंधन की कमियों को भी इसके संभावित कारणों में शामिल किया है। इस आंकड़े को सिंधु जल संधि विवाद का सीधा परिणाम बताने से पहले आधिकारिक रिपोर्ट और कमी के कारणों की पुष्टि जरूरी है।

आगे क्या होगा ?

सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद अब कानूनी, कूटनीतिक और तकनीकी -तीनों स्तरों पर आगे बढ़ सकता है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना पक्ष रख सकता है, जबकि भारत न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने और संधि में बदलाव की मांग पर कायम रह सकता है। अंतिम स्थिति दोनों देशों के कदमों, संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं और बातचीत पर निर्भर करेगी।