नई दिल्ली/जेनेवा, 21 अक्टूबर 2026 : भारत में छात्र आंदोलनों और अन्य विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर संयुक्त राष्ट्र के 16 विशेषज्ञों ने गहरी चिंता जताई है। विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान करने, प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में जवाबदेही तय करने का आग्रह भी किया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के बयान के मुताबिक विशेषज्ञों ने पिछले कुछ महीनों में नई दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित सख्त कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। इन प्रदर्शनों में छात्र और उनके समर्थक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों सहित विभिन्न मुद्दों के विरोध में सड़कों पर उतरे थे।
UN विशेषज्ञों ने पुलिस कार्रवाई पर क्या कहा ?
विशेषज्ञों के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अपने विचार रखने के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ प्रदर्शनों के दौरान अनुचित प्रतिबंध, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और मनमाने ढंग से हिरासत में लेने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। बयान में छात्र कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों पर भी चिंता व्यक्त की गई। विशेषज्ञों ने अधिकारियों से अपील की कि शांतिपूर्ण सभा करने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए और शिकायतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो। हालांकि, विशेषज्ञों की ओर से लगाए गए आरोपों और संबंधित घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि को अलग-अलग समझना जरूरी है। इन आरोपों पर भारत सरकार या संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
मार्च में छात्र और श्रमिक अधिकार कार्यकर्ताओं की हिरासत का मामला
बयान में मार्च के दौरान नई दिल्ली में छात्र और श्रमिक अधिकारों के लिए काम करने वाले 10 कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर हिरासत में लिए जाने का उल्लेख किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, सादे कपड़ों में मौजूद पुलिस अधिकारियों द्वारा हिरासत में लिए गए इन लोगों को कथित रूप से 24 घंटे से अधिक समय तक बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं करने दिया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार, धमकी और दबाव डालकर बयान लेने के आरोप लगाए गए। बयान के अनुसार बंदी प्रत्यक्षीकरण से जुड़ी कानूनी कार्यवाही के बाद इन कार्यकर्ताओं को रिहा किया गया। यह एक गंभीर आरोप है, जिसकी पुष्टि के लिए संबंधित कानूनी दस्तावेजों और अधिकारियों के पक्ष की जांच आवश्यक है।
हजारों लोगों को हिरासत में लेने का भी उल्लेख
UN विशेषज्ञों के बयान में मीडिया रिपोर्टों के हवाले से दावा किया गया कि नई दिल्ली में 7,000 से अधिक युवाओं, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को हिरासत में लिया गया था। रिपोर्ट में आरोप है कि हिरासत में लिए गए कुछ लोगों के फोन जब्त किए गए और प्रदर्शन से संबंधित सामग्री हटाई गई। यह भी कहा गया कि इनमें से कई लोगों को बाद में रिहा कर दिया गया।
मतदाता सूची और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी चिंता
विशेषज्ञों के बयान में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों के विरोध के अलावा मतदाता सूची में नाम हटाए जाने से संबंधित चिंताओं का भी जिक्र है। प्रदर्शनकारियों और आलोचकों की ओर से मतदाता सूची में बदलावों के संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, कथित रूप से प्रभावित लोगों की संख्या और विभिन्न सामाजिक समूहों पर उसके असर को लेकर किसी भी दावे की पुष्टि आधिकारिक आंकड़ों और संबंधित दस्तावेजों से की जानी चाहिए।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार क्यों महत्वपूर्ण है ?
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा कि शांतिपूर्ण सभा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, शांतिपूर्ण सभाओं पर लगाई जाने वाली पाबंदियां कानून के अनुरूप होनी चाहिए और उनका उद्देश्य वैध होना चाहिए। ऐसी पाबंदियां आवश्यक और अनुपातिक भी होनी चाहिए। उन्होंने कथित उल्लंघनों की जांच, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही और प्रभावित व्यक्तियों को न्याय दिलाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत में पुलिस कार्रवाई पर UN की चिंता, अब क्या अहम ?
संयुक्त राष्ट्र के 16 विशेषज्ञों की यह टिप्पणी शांतिपूर्ण प्रदर्शन, पुलिस की भूमिका और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया है। हालांकि, विशेषज्ञों की चिंता या आरोप अपने आप में किसी घटना के सभी तथ्यों की न्यायिक पुष्टि नहीं हैं। इस मामले में आगे की स्थिति समझने के लिए मूल UN बयान, भारत सरकार और संबंधित पुलिस अधिकारियों का पक्ष तथा हिरासत से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे।




