पटना, 29 अगस्त 2026 : बिहार की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान को अपनी लेखनी से आवाज देने वाले वरिष्ठ कवि एवं गीतकार सत्यनारायण का शुक्रवार को निधन हो गया। बिहार के चर्चित राज्य गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ के रचयिता सत्यनारायण ने 28 अगस्त की सुबह करीब तीन बजे पटना के कदमकुआं स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से बिहार के साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वरिष्ठ कवि सत्यनारायण के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की है। उन्होंने उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ किए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने उनके निधन को बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के लिए बड़ी क्षति बताया।
बिहार की मिट्टी और संस्कृति को दी आवाज
सत्यनारायण उन प्रमुख रचनाकारों में शामिल रहे, जिन्होंने अपनी कविताओं और गीतों के जरिए बिहार की मिट्टी, संस्कृति, इतिहास और सामाजिक चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी रचनाओं में आम लोगों की आवाज और सामाजिक सरोकार प्रमुखता से दिखाई देते थे। 13 सितंबर 1935 को भोजपुर जिले के कौलोडिहरी गांव में जन्मे सत्यनारायण 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान नुक्कड़ कवि के रूप में भी चर्चित हुए। उनकी रचनाओं में जनचेतना और सामाजिक बदलाव की स्पष्ट झलक देखने को मिलती थी। साहित्यिक परिचयों के अनुसार उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तुम ना नहीं कर सकते’, ‘टूटते जल-बिंब’, ‘सभाध्यक्ष हंस रहा है’, ‘सुनें प्रजाजन’ और ‘स्मृतियों में’ शामिल हैं।
‘मेरे भारत के कंठहार’ से मिली खास पहचान
सत्यनारायण की सबसे बड़ी पहचान बिहार के राज्य गीत ‘मेरे भारत के कंठहार, तुझको शत-शत वंदन बिहार’ के रचयिता के रूप में रही। इस गीत में बिहार के गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और महापुरुषों को शब्दों के जरिए सम्मान दिया गया है। बिहार सरकार ने मार्च 2012 में इस गीत को आधिकारिक राज्य गीत के रूप में अपनाया था। इस गीत को प्रसिद्ध संगीतकार एवं वादक शिवकुमार शर्मा और हरिप्रसाद चौरसिया की जोड़ी ने संगीत से सजाया था।
कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित
साहित्य के क्षेत्र में सत्यनारायण को कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिले। उन्हें गोपाल सिंह नेपाली पुरस्कार, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान, नागार्जुन सम्मान, रमण साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत सहित कई महत्वपूर्ण रचनाओं का भी सृजन किया। इसके अलावा बिहार हिन्दी प्रगति समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हिंदी और साहित्य के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वरिष्ठ कवि सत्यनारायण का निधन बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। उनकी रचनाएं और बिहार की पहचान को स्वर देने वाला उनका राज्य गीत आने वाली पीढ़ियों तक उनकी साहित्यिक विरासत को जीवित रखेगा।




