लखनऊ | 21 जुलाई 2026
उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ चलाए जा रहे पुलिस एनकाउंटर एक बार फिर बहस के केंद्र में आ गए हैं। हाल के दिनों में सामने आए कई मुठभेड़ों में आरोपियों के पैर में गोली लगने का लगभग एक जैसा पैटर्न देखने के बाद विपक्ष, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों ने कार्रवाई की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, उत्तर प्रदेश पुलिस का कहना है कि सभी मुठभेड़ कानून के दायरे में और आत्मरक्षा के तहत की गई कार्रवाई का हिस्सा हैं।
लगातार सामने आ रहे समान पैटर्न
पिछले कुछ दिनों में बलिया, बरेली, फिरोजाबाद और बदायूं समेत कई जिलों में हुई पुलिस मुठभेड़ों में आरोपियों के पैर में गोली लगने की घटनाएं सामने आई हैं। पुलिस की ओर से जारी प्रेस नोट में लगभग एक जैसी कार्यप्रणाली का उल्लेख किया गया है—मुखबिर से सूचना मिलने पर घेराबंदी, आरोपी द्वारा पुलिस पर फायरिंग, जवाबी कार्रवाई और फिर आरोपी के पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तारी।
इसी समान पैटर्न को लेकर अब सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में बहस तेज हो गई है।
पूर्व अधिकारियों और वकीलों ने उठाए सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज राय हंस ने कुछ एनकाउंटरों की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया कि कई मामलों में मुठभेड़ों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। वहीं पूर्व डीआईजी अमिताभ ठाकुर ने कहा कि किसी भी प्रकार का "ऑपरेशन लंगड़ा" जैसी शब्दावली पुलिस व्यवस्था की संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं मानी जा सकती। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक पुलिस मुठभेड़ के बाद स्वतंत्र एफआईआर दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
पुलिस का पक्ष भी स्पष्ट
उत्तर प्रदेश पुलिस लगातार यह कहती रही है कि सभी मुठभेड़ परिस्थितियों के अनुसार और आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई हैं। पुलिस के अनुसार कई मामलों में आरोपी पहले पुलिस टीम पर फायरिंग करते हैं, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई करनी पड़ती है। पुलिस का यह भी कहना है कि प्रत्येक मुठभेड़ की कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच कराई जाती है।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जारी बहस
लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया ही किसी भी तरह के विवाद को समाप्त करने का सबसे प्रभावी माध्यम मानी जाती है।




