गया जी (बिहार) | 2 जुलाई 2026

गया जी का धार्मिक महत्व क्यों है खास?

बिहार का गया शहर सनातन धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में गिना जाता है। यहां स्थित विष्णुपद मंदिर न केवल भगवान विष्णु के चरणचिह्नों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि पितरों के पिंडदान और श्राद्ध संस्कार का भी सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।

मूर्ति नहीं, भगवान विष्णु के चरणचिह्नों की होती है पूजा

विष्णुपद मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां किसी प्रतिमा की नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के चरणचिह्नों की पूजा की जाती है। मंदिर के गर्भगृह में लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे चरणचिह्न एक पवित्र शिला पर अंकित हैं, जिन्हें धर्मशिला कहा जाता है। इन चरणचिह्नों में शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे विष्णु के दिव्य प्रतीकों की आकृतियां भी दिखाई देती हैं। इन्हें चांदी से घिरे विशेष मंडल में सुरक्षित रखा गया है।

गयासुर की कथा क्या कहती है?

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार गयासुर नाम का एक असुर कठोर तपस्या के बाद ऐसा वरदान प्राप्त कर चुका था कि जो भी उसे देख ले, उसे मोक्ष मिल जाए। इससे धर्म और कर्म का संतुलन बिगड़ने लगा, क्योंकि बिना सत्कर्म किए भी लोग मोक्ष पाने लगे।

तब भगवान विष्णु ने गयासुर से धर्म की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने का आग्रह किया। गयासुर सहमत हो गया और भगवान विष्णु ने उसके वक्षस्थल पर अपना चरण रखकर उसे धरती के नीचे स्थिर कर दिया। मान्यता है कि उसी समय भगवान विष्णु के चरणों की छाप पत्थर पर अंकित हो गई, जो आज विष्णुपद मंदिर में पूजित है।

पिंडदान और गयासुर की भूख का संबंध

लोकमान्यताओं के अनुसार, धरती के नीचे दबने के बाद गयासुर ने भगवान विष्णु से पूछा कि वह अपनी भूख कैसे मिटाएगा। तब भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि जो भी श्रद्धालु गया में अपने पितरों के लिए पिंडदान, तर्पण और अन्न अर्पित करेगा, उससे गयासुर की भूख शांत होगी। यही कारण है कि गया में पिंडदान की परंपरा को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।

यह भी मान्यता है कि जब तक यहां पिंडदान होता रहेगा, गयासुर शांत रहेगा। हालांकि यह धार्मिक आस्था और पौराणिक मान्यता है, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

पितृपक्ष में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

हर वर्ष पितृपक्ष मेला के दौरान लाखों श्रद्धालु गया पहुंचकर फल्गु नदी के तट और विष्णुपद मंदिर में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। मान्यता है कि यहां किए गए पिंडदान से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

इतिहास और स्थापत्य

वर्तमान विष्णुपद मंदिर का पुनर्निर्माण 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध धर्मपरायण शासक महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। मंदिर का निर्माण काले ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है और इसकी स्थापत्य शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है।

धार्मिक विरासत का प्रतीक

विष्णुपद मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पौराणिक परंपराओं और पितृ श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। भगवान विष्णु के चरणचिह्न, गयासुर की कथा और पिंडदान की सदियों पुरानी परंपरा इस मंदिर को देश के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में शामिल करती है।