बिहार की सांस्कृतिक विरासत को मिली बड़ी पहचान

बिहार की सदियों पुरानी पिडिया-लेखन (पिडिया पेंटिंग) लोककला को अब भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। यह सम्मान केवल एक कला शैली की पहचान नहीं, बल्कि बिहार की लोक परंपरा, ग्रामीण संस्कृति और महिलाओं की रचनात्मक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस उपलब्धि के पीछे रोहतास जिले की लोक कलाकार विनीता कुमारी की वर्षों की मेहनत और समर्पण की बड़ी भूमिका रही है।

क्या है पिडिया-लेखन कला?

पिडिया-लेखन बिहार की पारंपरिक लोक चित्रकला है, जिसे मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाएं विशेष पर्व, धार्मिक अनुष्ठानों और पारिवारिक अवसरों पर घरों की दीवारों पर बनाती रही हैं। इस कला में प्राकृतिक रंगों और स्थानीय संसाधनों का उपयोग कर सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे, पक्षी, मानव आकृतियां, डोली और पारिवारिक जीवन से जुड़े प्रतीकों को उकेरा जाता है। यह चित्रकला भाई-बहन के स्नेह, पारिवारिक एकता और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत प्रतीक मानी जाती है।

दीवारों से दुनिया तक का सफर

लंबे समय तक यह कला गांवों की मिट्टी और गोबर से लिपी दीवारों तक ही सीमित रही। लेकिन विनीता कुमारी ने इसे नई दिशा देने का संकल्प लिया। उन्होंने पारंपरिक शैली को सुरक्षित रखते हुए इसे कागज और कैनवास पर उतारने का प्रयोग शुरू किया। शुरुआती दौर में यह आसान नहीं था, लेकिन लगातार अभ्यास और शोध के बाद उन्होंने इस लोककला को आधुनिक माध्यमों पर सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया।

पति की प्रेरणा बनी सबसे बड़ी ताकत

विनीता कुमारी बताती हैं कि इस यात्रा की शुरुआत उनके दिवंगत पति भुवनेश्वर भास्कर की प्रेरणा से हुई। उन्होंने गांवों में जाकर इस लोककला पर जानकारी जुटाई और महसूस किया कि इसकी असली पहचान महिलाओं के हाथों में ही सुरक्षित है। उनके प्रोत्साहन के बाद विनीता ने इस कला को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया और इसे व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में लगातार काम किया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंची कला

साल 2019 में विनीता कुमारी को संगीत नाटक अकादमी के कार्यक्रम में अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर मिला। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न कला आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेकर पिडिया-लेखन को नई पहचान दिलाई। इससे बिहार की यह लोककला देश की सीमाओं से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुंची।

GI टैग से क्या होगा फायदा?

विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद पिडिया पेंटिंग की मौलिक पहचान सुरक्षित रहेगी। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, स्थानीय कलाकारों को आर्थिक अवसर मिलेंगे और इस कला से जुड़े कारीगरों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिलेगी। साथ ही बिहार की सांस्कृतिक विरासत को भी नई मजबूती मिलेगी।

लोककला संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

पिडिया पेंटिंग को GI टैग मिलना बिहार के लिए गर्व का विषय माना जा रहा है। यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों को अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ ग्रामीण कलाकारों के लिए नए रोजगार और पहचान के अवसर भी तैयार करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कला को सरकारी और संस्थागत सहयोग लगातार मिलता रहा, तो पिडिया पेंटिंग भविष्य में बिहार की पहचान बनने वाली प्रमुख लोककलाओं में शामिल हो सकती है।