पटना, 22 अगस्त 2026 : बिहार की सियासत में इन दिनों सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार पर जनसुराज प्रमुख प्रशांत किशोर और नेता प्रतिपक्ष व राजद नेता तेजस्वी यादव लगातार निशाना साध रहे हैं। ऐसे में बिहार NDA की राजनीतिक रणनीति और सरकार की साख को लेकर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक जानकारों के बीच यह चर्चा तेज है कि मौजूदा परिस्थितियों में नीतीश कुमार की भूमिका एक बार फिर अहम हो सकती है। पूर्व सीएम व जदयू प्रमुख नीतीश कुमार के प्रस्तावित जनसंपर्क अभियान को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक पकड़ और अनुभव के जरिए NDA सरकार के पक्ष में माहौल मजबूत कर पाएंगे ?

PK लगातार साध रहे सम्राट सरकार पर निशाना

बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों के बाद प्रशांत किशोर सीएम सम्राट चौधरी पर लगातार हमलावर हैं। PK का दावा है कि चुनाव परिणाम के बाद सीएम की भाषा व प्राथमिकताओं में बदलाव आया है। प्रशांत किशोर ने आरोप लगाया है कि पहले सरकार की राजनीति में ‘एनकाउंटर’ जैसे मुद्दे प्रमुख थे, मगर अब फैक्ट्री, रोजगार मेला व शिक्षा जैसे मुद्दों पर जोर दिया जा रहा है। उनका कहना है कि जनता ने चुनाव में विकास और बच्चों के भविष्य को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है। PK के इन बयानों को जनसुराज की ओर से सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

तेजस्वी यादव भी सरकार को घेरने में जुटे

दूसरी ओर, राजद नेता तेजस्वी यादव भी सरकार की नीतियों और कामकाज को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष की कोशिश है कि सरकार के सामने मौजूद मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाया जाए। ऐसे में NDA सरकार के सामने चुनौती सिर्फ प्रशासनिक मोर्चे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव के स्तर पर भी है। अगर विपक्ष सरकार की उपलब्धियों का श्रेय अपने दबाव को देने में सफल होता है, तो इसका असर सरकार की राजनीतिक छवि पर पड़ सकता है।

क्या नीतीश कुमार बनेंगे NDA के संकटमोचक ?

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का लंबा प्रशासनिक अनुभव और सामाजिक समीकरणों पर पकड़ उन्हें NDA के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। यही वजह है कि उनकी प्रस्तावित यात्रा को लेकर राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा है। कहा जा रहा है कि जनता से सीधा संवाद कर नीतीश कुमार NDA सरकार के पक्ष में माहौल मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। खासकर अति पिछड़ा वर्ग और लव-कुश सामाजिक समीकरण को लेकर उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। हालांकि, इस रणनीति का दूसरा पहलू भी है। अगर नीतीश कुमार की यात्रा बेहद सफल रहती है और उनकी लोकप्रियता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आती है, तो इससे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की स्वतंत्र राजनीतिक छवि पर सवाल उठ सकते हैं।

BJP के केंद्रीय नेतृत्व की चुप्पी पर भी सवाल

इस बीच एक बड़ा सवाल यह है कि बिहार में राजनीतिक दबाव के बावजूद बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व सीधे तौर पर ज्यादा सक्रिय क्यों नहीं दिख रहा है ? एक तर्क यह दिया जा रहा है कि बिहार NDA के भीतर नीतीश कुमार की भूमिका को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व सीधे हस्तक्षेप करने से बच रहा है। नीतीश कुमार भले ही अब राज्यसभा की राजनीति में हैं, लेकिन बिहार की सत्ता और NDA के भीतर उनका प्रभाव अभी भी महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सम्राट चौधरी सरकार विपक्ष के हमलों का जवाब किस रणनीति से देती है और नीतीश कुमार की प्रस्तावित यात्रा NDA के लिए कितना राजनीतिक फायदा लेकर आती है। फिलहाल बिहार की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या नीतीश कुमार एक बार फिर NDA के संकटमोचक बनेंगे या सम्राट चौधरी खुद राजनीतिक दबाव का सामना करते हुए सरकार की पकड़ मजबूत करेंगे ?