मिट्टी बचाने और कम लागत में बेहतर खेती के तरीके

मोतिहारी: पूर्वी चंपारण के बंजरिया प्रखंड में किसानों के लिए आयोजित एक विशेष कृषि जागरूकता कार्यक्रम में खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने पर जोर दिया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान (MGIFRI), मोतिहारी और बिहार कृषि विभाग के संयुक्त प्रयास से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को मृदा संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग और आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देना था।

मिट्टी की सेहत सुधारने पर सबसे अधिक जोर

कार्यक्रम में कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। ऐसे में केवल रासायनिक खाद पर निर्भर रहने के बजाय जैविक खाद, जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक और हरी खाद जैसी तकनीकों को अपनाना समय की जरूरत है। वैज्ञानिकों ने कहा कि स्वस्थ मिट्टी ही बेहतर उत्पादन और पौष्टिक भोजन की सबसे बड़ी आधारशिला है।

ढैंचा की खेती से घटेगी यूरिया की जरूरत

विशेषज्ञों ने किसानों को धान की रोपाई से पहले ढैंचा (Sesbania) जैसी हरी खाद वाली फसल लगाने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि तैयार ढैंचा को खेत में मिलाने से मिट्टी में बड़ी मात्रा में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन उपलब्ध होती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, एक अच्छी ढैंचा फसल लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर उपलब्ध करा सकती है, जो लगभग 110 से 130 किलोग्राम यूरिया (करीब ढाई से तीन बोरी) के बराबर मानी जाती है। इससे उर्वरक लागत कम होने के साथ मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।

पराली जलाने से मिट्टी को होता है नुकसान

किसानों को सरल उदाहरण के माध्यम से समझाया गया कि जैसे उपजाऊ मिट्टी हटाने पर खेत की उत्पादकता घट जाती है, उसी तरह फसल अवशेष जलाने से मिट्टी का जैविक कार्बन, उपयोगी सूक्ष्मजीव और आवश्यक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की कि पराली जलाने के बजाय उसे खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग करें।

दलहनी फसलें बढ़ाएंगी मिट्टी की ताकत

कार्यक्रम के दौरान फसल विविधीकरण पर भी विशेष चर्चा हुई। किसानों को सलाह दी गई कि धान के साथ मूंग जैसी दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करें। इससे प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है और अगली फसल के लिए उर्वरकों की आवश्यकता भी कम पड़ती है।

कृषि विशेषज्ञों ने मौसम और रोपाई की अवधि के अनुसार धान की किस्मों का चयन करने की सलाह दी।

- 10 जुलाई तक रोपाई: 145–150 दिन वाली लंबी अवधि की किस्में।
- जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त की शुरुआत तक: 125–135 दिन वाली मध्यम अवधि की किस्में।
- अगस्त के मध्य तक देरी होने पर: 90–120 दिन वाली अल्प अवधि की किस्में।

विशेषज्ञों का कहना था कि सही समय पर सही किस्म का चयन करने से रबी फसलों की बुवाई समय पर हो सकेगी और उत्पादन पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा।

संतुलित उर्वरक और मृदा परीक्षण पर दिया गया जोर

कार्यक्रम में किसानों को नियमित मृदा परीक्षण कराने, आवश्यकता के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने, हरी खाद अपनाने, फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण करने और जैविक पदार्थ बढ़ाने की सलाह दी गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि इन उपायों से खेती की लागत घटेगी, उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करना भी आसान होगा।

59 किसानों ने लिया प्रशिक्षण

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 59 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 41 पुरुष और 18 महिला किसान शामिल थीं। प्रतिभागियों ने वैज्ञानिकों और कृषि अधिकारियों से सीधे संवाद कर मृदा स्वास्थ्य, उर्वरक प्रबंधन, फसल चक्र और आधुनिक कृषि तकनीकों से जुड़े कई सवाल पूछे। किसानों ने कार्यक्रम में दिए गए व्यावहारिक सुझावों को आगामी फसल सीजन में अपनाने की प्रतिबद्धता भी जताई।