वॉशिंगटन | 1 अगस्त

प्रशांत महासागर स्थित बिकिनी एटोल (Bikini Atoll), जहां अमेरिका ने 1946 से 1958 के बीच 23 परमाणु परीक्षण किए थे, अब वैज्ञानिकों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरा है। कभी परमाणु विस्फोटों से तबाह हुआ यह इलाका अब समुद्री जैव विविधता के पुनर्जीवन और कैंसर अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र बनता जा रहा है।

परमाणु परीक्षणों ने मचाई थी भारी तबाही

अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद बिकिनी एटोल को परमाणु परीक्षण स्थल बनाया था। यहां किए गए 23 परीक्षणों में 'कैसल ब्रावो' नामक हाइड्रोजन बम भी शामिल था, जिसे अमेरिका का सबसे शक्तिशाली परमाणु परीक्षण माना जाता है। इस विस्फोट ने समुद्र में विशाल गड्ढा बना दिया और आसपास के कई द्वीप पूरी तरह नष्ट हो गए। रेडिएशन के कारण वर्षों तक यह इलाका मानव गतिविधियों से लगभग पूरी तरह दूर रहा।

70 साल बाद लौटी समुद्री जैव विविधता

वैज्ञानिकों के अध्ययन में सामने आया है कि दशकों बाद इस क्षेत्र में समुद्री जीवन फिर से विकसित हो रहा है। कई प्रजातियों के कोरल, शार्क, टूना, स्नैपर और अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में दिखाई दे रहे हैं। हालांकि कुछ कोरल प्रजातियां अब भी वापस नहीं लौट सकी हैं, जिससे संकेत मिलता है कि परमाणु परीक्षणों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

इंसानी दखल नहीं होने से प्रकृति को मिला मौका

विशेषज्ञों का मानना है कि रेडिएशन के कारण लंबे समय तक मानव गतिविधियों पर लगी रोक ने समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को खुद को पुनर्जीवित करने का अवसर दिया। मछली पकड़ने और बसावट पर प्रतिबंध के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से संरक्षित समुद्री अभयारण्य जैसा बन गया।

कैंसर रिसर्च में खुल सकती है नई राह

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता अब यहां पाए गए कोरल और अन्य समुद्री जीवों के डीएनए का अध्ययन कर रहे हैं। वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उच्च रेडिएशन वाले वातावरण में भी ये जीव कैसे जीवित रहे और इनमें कैंसर जैसी बीमारियां क्यों विकसित नहीं हुईं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध अभी शुरुआती चरण में है। यदि इन जीवों की जैविक प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझा जा सका, तो भविष्य में रेडिएशन से सुरक्षा और कैंसर उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।