डिजिटल जीवनशैली का बढ़ता असर
मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट आज लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी, मनोरंजन और सोशल मीडिया के कारण बच्चे और युवा पहले से कहीं अधिक समय स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यही बढ़ता स्क्रीन टाइम अब आंखों की सेहत के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में Myopia (निकट दृष्टि दोष) और Dry Eye Syndrome के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है।
WHO और वैश्विक शोधों ने जताई चिंता
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ब्रायन होल्डन विजन इंस्टीट्यूट के शोध के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी यानी करीब 5 अरब लोग Myopia से प्रभावित हो सकते हैं। वर्ष 2000 में यह आंकड़ा लगभग 22 प्रतिशत था। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते उपयोग और बाहरी गतिविधियों में कमी इसके प्रमुख कारण हैं।
भारत में तेजी से बढ़ रहे मामले
भारत में विभिन्न नेत्र चिकित्सा संस्थानों और शोध अध्ययनों में पाया गया है कि शहरी क्षेत्रों के 20 से 40 प्रतिशत स्कूली बच्चे किसी न किसी स्तर के Myopia से प्रभावित हैं। AIIMS, LV Prasad Eye Institute और ICMR से जुड़े विशेषज्ञों ने भी चेतावनी दी है कि बच्चों में चश्मे का बढ़ता चलन केवल आनुवंशिक कारणों से नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली से भी जुड़ा है।
स्क्रीन टाइम कितना बढ़ चुका है?
महामारी के बाद ऑनलाइन पढ़ाई और वर्क फ्रॉम होम संस्कृति ने स्क्रीन टाइम को रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा दिया। कई अध्ययनों के अनुसार भारतीय युवा प्रतिदिन 6 से 10 घंटे तक मोबाइल या लैपटॉप स्क्रीन देखते हैं। वहीं किशोरों और छात्रों में औसत स्क्रीन टाइम 4 से 8 घंटे प्रतिदिन तक दर्ज किया गया है।
Dry Eye Syndrome क्यों बढ़ रहा है?
सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति एक मिनट में लगभग 15 से 20 बार पलक झपकाता है, लेकिन लगातार स्क्रीन देखने के दौरान यह संख्या घटकर 5 से 7 बार प्रति मिनट रह जाती है। इससे आंखों की नमी कम होने लगती है और Dry Eye Syndrome की समस्या पैदा होती है। इसके कारण आंखों में जलन, खुजली, लालपन, धुंधला दिखाई देना और सिरदर्द जैसी समस्याएं सामने आती हैं।
बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि जो बच्चे प्रतिदिन दो घंटे से कम समय खुले वातावरण में बिताते हैं, उनमें Myopia का जोखिम अधिक पाया गया है। प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने से आंखों का विकास बेहतर होता है और दृष्टि दोष का खतरा कम हो सकता है।
विशेषज्ञों की सलाह
नेत्र विशेषज्ञ 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। यानी हर 20 मिनट स्क्रीन देखने के बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर *किसी वस्तु को देखें। इसके अलावा रोजाना कम से कम 1-2 घंटे आउटडोर गतिविधियां, संतुलित स्क्रीन टाइम और नियमित आंखों की जांच जरूरी है।
निष्कर्ष
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बच्चों और युवाओं का स्क्रीन टाइम इसी रफ्तार से बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में आंखों की समस्याएं एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती हैं। समय रहते जागरूकता और सावधानी ही आंखों की रोशनी को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय है।
Patna
स्क्रीन टाइम बना आंखों का दुश्मन: भारत में बढ़ रहे Myopia और Dry Eye के मामले, युवाओं की रोशनी पर मंडरा रहा खतरा
WHO और अंतरराष्ट्रीय शोधों के अनुसार 2050 तक दुनिया की आधी आबादी Myopia से प्रभावित हो सकती है। भारत में भी बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों और युवाओं की आंखों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

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