बदल रही है दिल की बीमारी की तस्वीर

एक समय था जब हार्ट अटैक को बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब स्थिति तेजी से बदल रही है। देशभर के अस्पतालों में 30 से 45 वर्ष आयु वर्ग के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीयों में हृदय रोग विकसित होने की उम्र पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग 5 से 10 वर्ष पहले देखी जा रही है। हाल ही में सामने आए मेडिकल अध्ययनों ने भी संकेत दिया है कि युवाओं में अचानक मौत के प्रमुख कारणों में हृदय रोग सबसे ऊपर पहुंच चुका है।

भारत में कितनी गंभीर है स्थिति?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, भारत में होने वाली कुल मौतों में हृदय रोगों की हिस्सेदारी लगातार बड़ी बनी हुई है। देश में 40 से 69 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 45 प्रतिशत मौतें हृदय संबंधी बीमारियों से जुड़ी हैं। वहीं हालिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में होने वाली करीब 31 प्रतिशत मौतों के लिए कार्डियोवैस्कुलर डिजीज जिम्मेदार हैं।

AIIMS की स्टडी ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली स्थित AIIMS में किए गए एक अध्ययन में 2,214 पोस्टमार्टम मामलों का विश्लेषण किया गया। इनमें अचानक हुई मौतों के मामलों में 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की हिस्सेदारी 57.2 प्रतिशत पाई गई और अधिकांश मामलों में हृदय रोग प्रमुख कारण था। अध्ययन में औसत आयु लगभग 34 वर्ष दर्ज की गई।

आखिर क्यों बढ़ रहा है खतरा?

कार्डियोलॉजिस्ट बताते हैं कि लगातार तनाव, देर रात तक जागना, खराब खानपान, फास्ट फूड, मोटापा, शारीरिक गतिविधियों की कमी, धूम्रपान, शराब, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल युवाओं के दिल पर सीधा असर डाल रहे हैं। भारतीयों में आनुवंशिक जोखिम भी अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है, जिससे बीमारी कम उम्र में सामने आ सकती है।

ये संकेत बिल्कुल नजरअंदाज न करें


विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार थकान, सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना, सीने में दबाव, गर्दन, जबड़े या बाएं हाथ में दर्द, चक्कर आना, अत्यधिक पसीना आना और बिना कारण बेचैनी महसूस होना शुरुआती चेतावनी संकेत हो सकते हैं। कई बार हार्ट अटैक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी होता है, इसलिए इसे “साइलेंट हार्ट रिस्क” कहा जा रहा है।

बचाव ही सबसे बड़ी सुरक्षा

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित हार्ट चेकअप, ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच करानी चाहिए। प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट व्यायाम, पर्याप्त नींद, तनाव नियंत्रण और संतुलित आहार हृदय रोग के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। समय रहते पहचान और उपचार से अधिकांश गंभीर मामलों को रोका जा सकता है।