नई दिल्ली, 12 अगस्त 2026 : भारत की अर्थव्यवस्था, रोजगार और युवाओं के अवसरों को लेकर ब्रिटिश अखबार Financial Times (FT) की एक रिपोर्ट पर पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कंवल सिब्बल ने रिपोर्टिंग के नजरिए पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि कुछ पश्चिमी मीडिया संस्थान भारत को लेकर पहले एक नकारात्मक नैरेटिव तैयार करते हैं और फिर उसी को मजबूत करने वाले आलोचकों के बयान तलाशते हैं। कंवल सिब्बल ने Financial Times पर भारत के खिलाफ बार-बार नकारात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि इस तरह की रिपोर्टिंग से पाठकों के सामने एक ऐसी तस्वीर बन सकती है, जिसमें पहले से तय निष्कर्ष को अलग-अलग विशेषज्ञों और आलोचकों के बयानों के जरिए सही साबित करने की कोशिश की जाती है।
‘पहले कहानी तय, फिर आलोचक तलाशते हैं’
कंवल सिब्बल ने कहा कि कुछ पश्चिमी पत्रकार पहले यह तय करते हैं कि भारत को लेकर किस तरह की नकारात्मक खबर पेश करनी है। इसके बाद ऐसे भारतीय आलोचकों की तलाश की जाती है, जिनके बयान उस नैरेटिव को मजबूती दे सकें। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया से रिपोर्ट को निष्पक्ष और व्यापक रिसर्च पर आधारित दिखाने की कोशिश होती है, जबकि असल सवाल रिपोर्टिंग के शुरुआती दृष्टिकोण पर खड़ा होता है। कंवल सिब्बल ने Financial Times की विश्वसनीयता का भी जिक्र करते हुए कहा कि पश्चिमी मीडिया में उसकी प्रतिष्ठा का इस्तेमाल भारत को लेकर नकारात्मक धारणा बनाने के लिए किया जा सकता है।
भारत की आर्थिक ग्रोथ पर FT ने क्या कहा ?
Financial Times की रिपोर्ट में भारत की आर्थिक वृद्धि के साथ रोजगार की स्थिति और युवाओं के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार 6 फीसदी से अधिक आर्थिक वृद्धि को अपनी उपलब्धियों में गिनाती है, लेकिन रोजगार और अवसरों को लेकर युवाओं में असंतोष की स्थिति बनी हुई है। रिपोर्ट में CMIE के आंकड़ों का हवाला देते हुए बेरोजगारी से जुड़े आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार पिछले वित्त वर्ष में भारत की कुल बेरोजगारी दर 6.9 फीसदी रही, जबकि ग्रेजुएट युवाओं में यह दर 14.5 फीसदी और 20-24 आयु वर्ग में 36 फीसदी बताई गई।
रोजगार से लेकर निजी निवेश तक उठे सवाल
FT की रिपोर्ट में भारत के विकास मॉडल, निजी निवेश और रोजगार सृजन को लेकर कुछ अर्थशास्त्रियों और सरकार के आलोचकों की राय शामिल की गई। अर्थशास्त्री महेश व्यास के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया कि तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद पर्याप्त संख्या में नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं। वहीं, संतोष मेहरोत्रा ने नोटबंदी, GST और कोरोना लॉकडाउन जैसे फैसलों के अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव को लेकर अपनी राय रखी। रिपोर्ट में निजी निवेश की हिस्सेदारी, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार और AI तथा ऑटोमेशन के कारण IT क्षेत्र पर पड़ने वाले संभावित असर का भी उल्लेख किया गया।
युवाओं की नौकरी पर क्यों हो रही बहस ?
भारत की तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार की गुणवत्ता और पर्याप्त नौकरियां पैदा करने को लेकर बहस लगातार जारी है। खासकर शिक्षित और युवा आबादी के बीच रोजगार के अवसर एक अहम मुद्दा बने हुए हैं। एक तरफ भारत की आर्थिक वृद्धि को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बेरोजगारी, स्किल और रोजगार की गुणवत्ता जैसे सवाल भी उठते रहे हैं।
सिब्बल की टिप्पणी से रिपोर्टिंग पर नई बहस
Financial Times की रिपोर्ट के बाद अब बहस सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार तक सीमित नहीं है। कंवल सिब्बल की टिप्पणी ने पश्चिमी मीडिया की भारत संबंधी रिपोर्टिंग के नजरिए पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, FT की रिपोर्ट में जिन आर्थिक आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय का इस्तेमाल किया गया है, उन्हें अलग-अलग स्रोतों और आधिकारिक आंकड़ों के संदर्भ में देखना जरूरी है। वहीं सिब्बल की टिप्पणी उनके व्यक्तिगत आकलन को दर्शाती है।




