अंकारा, 24 अक्टूबर 2026 : दुनिया में दुर्लभ मृदा तत्वों यानी Rare Earth Elements (REEs) की बढ़ती मांग के बीच तुर्की के किजिलकाओरेन भंडार ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। चीन और तुर्की के शोधकर्ताओं ने इस भंडार के भूवैज्ञानिक विकास का अध्ययन किया है। शोध से यह समझने में मदद मिली है कि यहां दुर्लभ मृदा तत्व किस तरह जमा हुए। हालांकि इस भंडार की मौजूदगी अपने आप में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खनन की गारंटी नहीं है। रेयर अर्थ तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स व कई आधुनिक तकनीकों में इस्तेमाल होने वाले महत्वपूर्ण खनिज हैं। इनके उत्पादन और प्रसंस्करण में चीन की मजबूत स्थिति के कारण दुनिया के कई देश वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाश रहे हैं। ऐसे में तुर्की का किजिलकाओरेन भंडार रणनीतिक रूप से काफी अहम हो सकता है।

चीनी और तुर्की वैज्ञानिकों ने कैसे किया अध्ययन ?

रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने चट्टानों की रासायनिक संरचना, खनिजों के विश्लेषण, फ्लोराइट में मौजूद सूक्ष्म तत्वों और स्ट्रोंटियम आइसोटोप से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। इन जानकारियों के आधार पर उन्होंने भंडार के बनने की प्रक्रिया को समझने की कोशिश की। शोध में खनिज निर्माण के तीन प्रमुख चरणों की पहचान की गई। शुरुआती चरण में कार्बोनेटाइट मैग्मा आसपास की चट्टानों में पहुंचा। इसके बाद मैग्मा के विकास के साथ दुर्लभ मृदा तत्वों, फ्लोरीन और सल्फेट से समृद्ध गर्म तरल पदार्थ बने, जिनसे धातुओं के परिवहन और संकेंद्रण में मदद मिली। अंतिम चरण में वर्षा से आया पानी भूवैज्ञानिक प्रणाली में प्रवेश कर गया। इससे चट्टानों में बदलाव हुए और फ्लोराइट, बैराइट तथा दुर्लभ मृदा तत्वों वाले खनिजों के जमाव की प्रक्रिया प्रभावित हुई। यह अध्ययन इस बात को समझने में मदद करता है कि किजिलकाओरेन जैसे भंडार किस तरह बने और उनमें मौजूद खनिजों को निकालने की संभावनाओं का मूल्यांकन कैसे किया जा सकता है।

4.67 मिलियन टन अयस्क, लेकिन खनन की राह आसान नहीं

रिपोर्ट में किजिलकाओरेन भंडार में करीब 4.67 मिलियन टन अयस्क और रेयर अर्थ ऑक्साइड का औसत ग्रेड 2.78 प्रतिशत बताया गया है। इन आंकड़ों को समझना जरूरी है, क्योंकि अयस्क का कुल वजन और उसमें मौजूद दुर्लभ मृदा ऑक्साइड की मात्रा एक ही चीज नहीं हैं। किसी खनिज भंडार का व्यावसायिक महत्व तय करने के लिए केवल उसकी मात्रा पर्याप्त नहीं होती। खनिजों को अलग करने की तकनीक, उत्पादन लागत, बुनियादी ढांचा, बाजार मूल्य और पर्यावरणीय प्रभाव भी अहम होते हैं। शोधकर्ताओं ने यह ध्यान दिलाया है कि दुर्लभ मृदा तत्वों के कुछ भंडारों में रेडियोधर्मी तत्व मौजूद हो सकते हैं। ऐसे मामलों में खनन और प्रसंस्करण के दौरान सुरक्षा व पर्यावरण प्रबंधन की जरूरत बढ़ जाती है। इसलिए किजिलकाओरेन भंडार तुर्की के लिए मौका जरूर पेश करता है पर इसके वास्तविक आर्थिक लाभ का आकलन विस्तृत तकनीकी और व्यावसायिक अध्ययन के बाद ही किया जा सकता है।

चीन के विशाल भंडार से तुलना क्यों अहम ?

रेयर अर्थ की वैश्विक आपूर्ति में चीन की महत्वपूर्ण भूमिका है। रिपोर्ट में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के 2025 के अनुमान का हवाला देते हुए चीन के भंडार करीब 44 मिलियन टन, ब्राजील के 21 मिलियन टन और ऑस्ट्रेलिया के 6.3 मिलियन टन बताए गए हैं। रिपोर्ट में चीन के इनर मंगोलिया क्षेत्र स्थित बयान ओबो भंडार का भी उल्लेख है, जिसे दुनिया के प्रमुख दुर्लभ मृदा खनिज क्षेत्रों में गिना जाता है। किजिलकाओरेन की तुलना ऐसे विशाल भंडारों से करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग रिपोर्टों में भंडार की परिभाषा, आकलन के तरीके और आंकड़ों का आधार अलग हो सकता है। यही कारण है कि किसी एक भंडार की तुलना के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि तुर्की जल्द ही चीन के बराबर पहुंच जाएगा।

क्या तुर्की को मिलेगा रणनीतिक फायदा ?

तुर्की के लिए किजिलकाओरेन भंडार का महत्व केवल खनिज संसाधन तक सीमित नहीं है। अगर भविष्य में इसका खनन आर्थिक रूप से व्यवहार्य साबित होता है और प्रसंस्करण की क्षमता विकसित होती है, तो देश को औद्योगिक उत्पादन और आपूर्ति शृंखला में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। दुनिया के कई देश महत्वपूर्ण खनिजों के लिए सीमित आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता घटाना चाहते हैं। ऐसे माहौल में तुर्की का यह भंडार भविष्य में उपयोगी विकल्प बन सकता है। हालांकि, इसके लिए निवेश, तकनीक, पर्यावरणीय मंजूरी और बाजार की मांग जैसे पहलुओं पर काम करना होगा।फिलहाल शोध का महत्व भंडार की भूवैज्ञानिक संरचना को बेहतर ढंग से समझने में है। तुर्की के लिए यह एक अवसर है पर इसे वैश्विक रेयर अर्थ बाजार में बड़ी ताकत बनने की गारंटी नहीं माना जा सकता।